Welcome, Guest   [ Register | Sign In | Take a tour | Adult Filter: On ]

टैग्स: ओशो


ब्लॉग्स (25)
सिर्फ़ औरतमैं औरत थी, चाहे बच्ची-सी, और यह खौफ़-सा विरासत में पाया था कि दुनिया के भयानक जंगल से मैं अकेली नहीं गुज़र सकती, और शायद इसी भय में से अपने साथ के लिए मर्द के मुंह की कल्पना करना- मेरी कल्पना का अंतिम साधन था..... पर इस मर्द शब्द के मेरे अर्थ ... आगे पढ़ें...

मेरे बच्चों, किस नाम से पुकारूं तुम्हें? किमी, अवि या वो नाम जो मैंने तुम दोनों को बचपन में दिए थे..... लेकिन सिर्फ़ कुछ लोगों के कारण ज़िद में आ कर बदलना पड़े थे... और वो नाम थे "चुनमुन" और "रिमझिम"...किमी, आज से तुम्हें फिर चुनमुन कह के पुकारने का मन ... आगे पढ़ें...

-"जीवन के चमत्कारों से तो मैं यूं भी अभिभूत हो रही थी| ऊपर से उन पर मोहर लगाने के लिए जब कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं कि अस्तित्व के समक्ष अहोभाव से भर जाती हूँ..... शब्द खो जाते हैं ........ समय विलुप्त होने लगता है.... मेरा मैं खोने लगता है और जीवन के ... आगे पढ़ें...