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चैनल: बातें कुछ अनकही सी


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ब्लॉग्स (24)
कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों के साथ बहुत कुछ साथ है, कानों में घुलता संगीत, टेबल पर कुछ किताबें रखी हैं, पुखराज, वर्जित बाग की गाथा, कुछ अटके कुछ भटके, इन सभी के साथ शोभा डे का एक मोटा सा अंग्रेजी नॉवेल भी है- सुपर स्टार्स ऑफ इंडिया........... ये सब मेरे ... आगे पढ़ें...

सहरा की गर्म मिजाजी से परेशान एक रात लड़ती रही रातभरसुकून की ठंडी चादर का कोना थामे एक रात सिसकती रही रातभर चाँद खामोश-सा देखता रहा बादल के झरोखों सेतारों की मस्ती चलती रही रातभर शिकायतों की रेत थी जो आँखों में उड़ती रही वो दामन से सितारे झटकती रही ... आगे पढ़ें...

मैं उन्मादित हूँ पर नदी नहीं गहराई हूँ पर समन्दर नहीं तपती हूँ पर रेगिस्तान नहीं मैं रेगिस्तान में भटकते प्यासे की मरिचिका हूँमैं शोर हूँ पर शब्द नहीं इश्क हूँ हौसला नहीं खामोशी हूँ सुकून नहीं जिस पर आकर लहरें सूख जाती है मैं वो समेटा हुआ किनारा हूँवो ... आगे पढ़ें...

संवादों के पुल पर खड़े थे हम दोनों और नीचे खामोशी की नदी बह रही थी न जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया.... आगे पढ़ें...


एक बार फिर मैं लौट आई हूँ देह समेत, और रूह का एक कोना फाड़ करइश्क के दरख़्त पर बाँध दिया है, मन्नत पूरी होने के इंतज़ार में..... आगे पढ़ें...

जीवन की ऊहापोह में प्रेम, जैसे भीड़ में माँ के हाथ से बच्चे की ऊँगली छूट जाती हैसबसे व्यस्त दिन में उदासी, बेझिझक घर में घुस आती बेखौफ हवाएँ जो थमने के बाद पैरों में मिट्टी छोड़ जाती हैमन की बैचेनी में यादों का दखलघर के आँगन के पुराने दरख्त परबिना पूछे ... आगे पढ़ें...


जब पुकार घर की दीवारों से टकराकर लौट आएजब दोस्त कही हुई बात भूल जाएजब मंदिर की घंटियाँ शोर मचाएऔर टीवी के सामने बच्चे खामोश हो जाए..... जब मन की हलचल शब्दों में उलझ जाए, जब विचारों का धागा टूट जाए जब अपनी कही बात भी समझ न आएऔर सड़के कार और बसों के नीचे दब ... आगे पढ़ें...

तुम सच की धरातल पर खड़े किसी महात्मा की मूरत की तरह जिसको लोग नमस्कार कर आगे बढ जाते हैं एक और झूठ बोलने के लिए, मैं कल्पना के आसमान में उड़ती अदनी-सी चिड़िया। तुम सच के विकृत रूप को नीडरता से स्वीकार करने वाले रोशनी से भरपूर दिन मैं सपने के सच हो जाने के डर ... आगे पढ़ें...

हँस लेता हूँ खुद परजब कभी आज़ाद होने का खयाल आता है मैं घर छोड़ कर कई बार निकल जाता हूँक्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ ज़िम्मेदारियों से मैं शहर छोड़कर चला जाता हूँ अकसर क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ रोजी रोटी के झँझटों से मैं देश छोड़ कर चला जाता हूँ कभी ... आगे पढ़ें...

एक रात तन्हाई संग छत पर टहलने निकलीतो देखा आसमान के आँगन में चाँद का अचार रखा था माँ उसे उठाना भूल गई थीतो तारे उस पर लग गए थेमैं उसे उठाकर ले आईआँसुओं से धोया और सपने के छज्जे पर रख दिया जब कभी दोपहर बेस्वाद हो जाती थी चाँद का अचार चख लेती थी कभी कविता ... आगे पढ़ें...

मुझे तलाश है एक ऐसे जहाँ की जहाँ मुझे अभिनय न करना पड़े रिश्तों के चरित्र में ढलकर, जहाँ मुझे बँटना न पड़े जैसे बँट जाते है कमरे एक ही घर के मैं जिस कमरे में जाती हूँ उस कमरे-सी हो जाती हूँ, थोड़ा बँट जाती हूँ सुबह की चाय के साथ चुस्कियों में, दोपहर के खाने ... आगे पढ़ें...

घर की दहलीज को पार कर आँगन में धूप सेंकते-से,कभी मोहल्ले के शोर में पड़ोसी के साथ फुसफुसाते हुएकभी समाज की संकुचित विचारधारा, कभी मॉडर्न सॉसाइटी को कोंसते-से कभी मन की उलझनों में फँसे तो कभी परमात्मा को खोजते-से कभी जीवन में मदहोश कभी मृत्यु पर रोते-से कभी ... आगे पढ़ें...

मैं कई सदियों तक जीती रही तुम्हारे विचारों का घुंघट अपने सिर पर ओढे, मैं कई सदियों तक पहने रही तुम्हारी परम्पराओं का परिधान, कई सदियों तक सुनती रही तुम्हारे आदेशों को, दोहराती रही तुम्हारे कहे शब्द, कोशिश करती रही तुम जैसा बनने की। तुम्हारे शहर ... आगे पढ़ें...

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