 सिर्फ़ औरतमैं औरत थी, चाहे बच्ची-सी, और यह खौफ़-सा विरासत में पाया था कि दुनिया के भयानक जंगल से मैं अकेली नहीं गुज़र सकती, और शायद इसी भय में से अपने साथ के लिए मर्द के मुंह की कल्पना करना- मेरी कल्पना का अंतिम साधन था..... पर इस मर्द शब्द के मेरे अर्थ ... आगे पढ़ें...
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 -"जीवन के चमत्कारों से तो मैं यूं भी अभिभूत हो रही थी| ऊपर से उन पर मोहर लगाने के लिए जब कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं कि अस्तित्व के समक्ष अहोभाव से भर जाती हूँ..... शब्द खो जाते हैं ........ समय विलुप्त होने लगता है.... मेरा मैं खोने लगता है और जीवन के ... आगे पढ़ें...चैनल: प्रेम, प्रतीक्षा, प्रणय और परमात्मा..., तीसरी दुनिया, अमृता और ओशो, पत्र नायिका के नाम , बातें कुछ अनकही सी, अधूरी कहानियाँ, मेरी पसंद, जीवन के रंगमंच ..., मेरा कोना, मेरी दुनिया, सपनों की दुनिया, दो दुनिया
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 कई हजार चाबियाँ मेरे पास थीं और एक-एक चाबी एक-एक दरवाज़े को खोल देती थीं दरवाज़े के अंदर किसी के सोने का कमरा भी और घरवालों के दुख जो उनके ही होते थे, पर किसी समय मेरे भी होते थे मेरी छाती की पीड़ा की तरह पीड़ा, जो दिन के समय जागूँ, तो जाग पड़ती थी, पर फिर भी ... आगे पढ़ें...
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 Change yourself to change the world!I have found a totally different approach of changing the world: you just change yourself. And when you are rejoicing and dancing, you will find somebody by your side had started dancing with you, because we are all the ... आगे पढ़ें...
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 हाफिज़ शीराज़ी के एक फ़ारसी शेर का तरजुमा करे, तो कुछ इस तरह होगा- "साकी, जाम ग़र्दिश में ला और मुझे दे ! इब्तदा-ए-इश्क़ तो आसान नजर आया, लेकिन इंतहा बहुत मुश्किल हुई..... " दुनिया की शेरो-शायरी में कुछ ऐसे अशआर भी होते हैं, जो एक नजर देखने के लिए नहीं होते, न ... आगे पढ़ें...
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 क़ानून किसी अजनबी मर्द-औरत को रिश्ता बनाने कासिर्फ़ मौका देता है रिश्ता नहीं ...... रिश्ता बने या न बने इसका न क़ानूनफिक्र करता है और ना ज़िम्मा लेता है ..... - इमरोज़ आगे पढ़ें...
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 यथार्थ से यथार्थ तक - (रसीदी टिकट से)आत्मकथा को प्राय: चमकती-दमकती एकांगी सच्चाई समझा जाता है, आत्मश्लाघा का कलात्मक माध्यम, पर बुनियादी सच्चाई को लेखक की अपनी आवश्यकता मानकर मैं कहना चाहूँगी, यह यथार्थ से यथार्थ तक पहुँचने की प्रक्रिया है। एक कुछ वह होता ... आगे पढ़ें...
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अमृता हमारी मंडियों में गेहूँ बिकता है, ज्वार बिकती है और औरत भी बिकती है.... आर्थिक गुलामी जब औरत को दास बनाती है, वही दासता मानसिक गुलामी बन जाती है। मानसिक गुलामी जब नासूर बन जाती है, तब लोग नासूर के बदन पर पवित्रता की रंगीन पोशाक पहना देते हैं, और वह ... आगे पढ़ें...
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 "आप अपने लिखे में आत्मा को इतना रटती रहती हैं"
'रांझा-रांझा' करदी हुण मैं आपे रांझा होई' आगे पढ़ें...
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अपनी एक दोस्त के लिए एक किताब खरीदने गई थी। चाहे जितनी किताबे छान लूँ, नज़रे दो ही जगह होती है या तो ओशो या अमृता प्रीतम। कई दोस्त टोक चुके हैं- दुनिया में और भी बहुत कुछ है पढ़ने के लिए, अब निकलो इन दोनों से। मैं बस कह देती हूँ- खुद से निकल कर कहाँ ... आगे पढ़ें...
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तेरी यादेंबहुत दिन बीतेजलावतन हुईंजीतीं हैं या मर गयीं-कुछ पता नहींसिर्फ एक बार एक घटना हुई थीख्यालों की रात बड़ी गहरी थीऔर इतनी स्तब्ध थीकि पत्ता भी हिलेतो बरसों के कान चौंक जाते..फिर तीन बार लगाजैसे कोई छाती का द्वार खटखटायेऔर दबे पांव छत पर चढ़ता कोईऔर ... आगे पढ़ें...
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I will meet you yet againHow and Where?I know notPerhaps I will become afigment of your imaginationand maybe spreading myselfin a mysterious lineon your canvasI will keep gazing at youPerhaps I will become a rayof sunshine to beembraced by your coloursI ... आगे पढ़ें...
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मेरी सेज हाजिर हैपर जूते और कमीज की तरहतू अपना बदन भी उतार देउधर मूढ़े पर रख देकोई खास बात नहींबस अपने अपने देश का रिवाज है……-अमृता प्रीतम आगे पढ़ें...
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बरसों की आरी हंस रही थीघटनाओं के दाँत नुकीले थेअकस्मात एक पाया टूट गयाआसमान की चौकी पर सेशीशे का सूरज फिसल गयाआँखों में कंकड़ छितरा गयेऔर नजर जख्मी हो गयीकुछ दिखायी नहीं देतादुनिया शायद अब भी बसती है-अमृता प्रीतम आगे पढ़ें...
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