|
|
|
आखिरी अलविदा से पहले कह दूँ इक बार कि जो रास्ता मुझ तक आता है वो सिर्फ इकतरफा होता है मेरे लिए जहाँ से होकर में गुजरती हूँ अलग-अलग किस्सों से बँटोरती हूँ कुछ अधूरी-सी ख़्वाहिशें, अधूरे-से ख़्वाब, और उन्हीं रास्तों पर बो देती हूँ कुछ यादें, कुछ बातें जहाँ ... आगे पढ़ें...
|
ऑफिस की पार्किंग पर खड़े होकर कहता रहा मुझसे........ समय हो तो सब कुछ है वर्ना किसे फुर्सत है कि सोचे कि कभी प्यार भी हुआ करता था इन आँखों में अब तो सिर्फ चश्मा चढ़ा रहता हैऔर उँगलियाँ की-बोर्ड पर अटकी रहती है... हाँ कभी कम्प्यूटर हैंग हो जाता हैतो याद आ ... आगे पढ़ें...
|
मैं एक रूह देह के लिबास में जीवन के शो रूम में सजाया हुआजिसका लिबास जितना सुंदर उतनी ज्यादा उसकी कीमत जो जितना आम फैशन से अलग उतना यूनिक मैं एक लिबास रूह को पहनाया हुआ जो जितने कम लिबास में उतना ज्यादा कॉंट्रोवर्शियल लिबास जितना पारदर्शी आत्मा उतनी ... आगे पढ़ें...
|
 उसके हाथ में उठ आए फफोलों से रिसते पानी का मेरी आँखों से बहते आँसुओं से कोई मुकाबला नहीं था। शायद इसीलिए तीन दिन से बहती मेरी आँखें एकदम से सूख गई थी। तीन दिन से जीवन की ऊहापोह में फँसे शब्द उसको देखकर गले में अटक-से गए थे। उसे कुछ कहना रिश्ते को छोटा ... आगे पढ़ें...
|
अधूरी कहानी में कोई नायक नहीं होता, न कोई नायिका, इसमें सिर्फ संवाद होते हैं, जो अकसर उन दो लोगों के बीच होते हैं, जिनको न कल्पनाओं का पूरा आसमान मिल पाता है न सच की धरातल पर खड़े होने की जगह। कुछ रिश्ते बस यूँ ही इन दो धूरियों के बीच अपना अस्तित्व तलाशते ... आगे पढ़ें...
|
शब्दों की चरम सीमा को छूकर लौट आई हूँ खामोशी के पेहरन में, जैसे कोई आँगन की मिट्टी को माथे पर लगाकर अनजाने सफर को निकलता है..................... आगे पढ़ें...
|
एक समय था जब लगता था कि कुछ कायनाती कण हवा से होते हुए साँसों में घुल रहे हैं। मुझे पवित्रता की सुगंध से सराबोर लगती थी अपनी ही देह अक्सर, फिर न जाने क्या हुआ कि मैं कण कण बिखरती रही, घुलती रही मिट्टी में...और सूखती रही बंजर धरती की तरह............. एक ... आगे पढ़ें...
|
आज पहली बार प्रतीत हुआ, प्रेम किसे कहते है...... ओशो को बहुत बार पढ़ा है, सिर्फ पढ़कर ही मुग्ध हो जाया करती थी, लेकिन आज जैसे उनके द्वारा लिखा गया एक-एक शब्द मुझे अपने जीवन से गुजरता हुआ मेहसूस हो रहा है। दो लोगों का एक जैसा मेहसूस करना और एक दूसरे के ... आगे पढ़ें...
|
कई दिन कई रातें बीतती रही, साँसे चलती थी जीवन नहीं, समय को कस लिया था मोटी जंज़ीरों में .... खामोशी को रोक लिया था बाँहों में.... बस एक मृत देह की तरह.................... आगे पढ़ें...
|
समझौतों की शर्तों पर ईच्छाओं की बलि चढ़ाकर जीवन निर्माण नहीं होता..... रात की गली में नींद को आवाज़ लगाकर स्वप्न निर्माण नहीं होता..... घर के आँगन में रिश्तों को बोकर खुशियों का निर्माण नहीं होता.... दहलीज़ तक जाकर लौट आने से सफर का निर्माण नहीं ... आगे पढ़ें...
|
सीने में उठते सारे ग़ुबार बर्फ से जम चुके हैं, आँसूं सिर्फ आँखों को धो रहे हैं, दिल के बादल अब भी नहीं बरसे हैं। अपना रिश्ता बंजर भूमि पर खरपतवार-सा उग आया है। तुम कितना ही इश्क का पानी देते रहो, खरपतवार पर सुगंधित फूल नहीं उगते। बस उम्र को यूँ ही बालों ... आगे पढ़ें...
|
उम्र आँगन के पार गलियों में झाँकनेवाली तो नहीं थी, फिर भी आँखों की किलकारियाँ बाज नहीं आती थी। चंचलता को आँखों में ओझल करना मेरे बस में नहीं था। बस ऐसे ही दिन निकल रहे थे, कभी यौवन के साथ लुकाछीपी का खेल खेलते हुए, तो कभी संयम के डोरों को बस हाथों से ... आगे पढ़ें...
|