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  श्रेणियाँ > बातें कुछ अनकही सी  (21)

जो बातें हम किसी से कह नहीं पाते, और कहे बिना रह नहीं पाते उन बातों के लिए यहाँ जगह बनाई है..............

• संवादों के पुल पर

संवादों के पुल पर खड़े थे हम दोनों और नीचे खामोशी की नदी बह रही थी न जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया....   और पढ़ें...
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• विचारों की भीड़

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• मन्नत

एक बार फिर मैं लौट आई हूँ देह समेत, और रूह का एक कोना फाड़ करइश्क के दरख़्त पर बाँध दिया है, मन्नत पूरी होने के इंतज़ार में.....   और पढ़ें...
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• जीवन की ऊहापोह

जीवन की ऊहापोह में प्रेम, जैसे भीड़ में माँ के हाथ से बच्चे की ऊँगली छूट जाती हैसबसे व्यस्त दिन में उदासी, बेझिझक घर में घुस आती बेखौफ हवाएँ जो थमने के बाद पैरों में मिट्टी छोड़ जाती हैमन की बैचेनी में यादों का दखलघर के आँगन के पुराने दरख्त परबिना पूछे ...   और पढ़ें...
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• चाँद का अचार

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• खालीपन

जब पुकार घर की दीवारों से टकराकर लौट आएजब दोस्त कही हुई बात भूल जाएजब मंदिर की घंटियाँ शोर मचाएऔर टीवी के सामने बच्चे खामोश हो जाए..... जब मन की हलचल शब्दों में उलझ जाए, जब विचारों का धागा टूट जाए जब अपनी कही बात भी समझ न आएऔर सड़के कार और बसों के नीचे दब ...   और पढ़ें...
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• सिर्फ एक औरत

तुम सच की धरातल पर खड़े किसी महात्मा की मूरत की तरह जिसको लोग नमस्कार कर आगे बढ जाते हैं एक और झूठ बोलने के लिए, मैं कल्पना के आसमान में उड़ती अदनी-सी चिड़िया। तुम सच के विकृत रूप को नीडरता से स्वीकार करने वाले रोशनी से भरपूर दिन मैं सपने के सच हो जाने के डर ...   और पढ़ें...
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• मैं आज़ाद हूँ?

हँस लेता हूँ खुद परजब कभी आज़ाद होने का खयाल आता है मैं घर छोड़ कर कई बार निकल जाता हूँक्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ ज़िम्मेदारियों से मैं शहर छोड़कर चला जाता हूँ अकसर क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ रोजी रोटी के झँझटों से मैं देश छोड़ कर चला जाता हूँ कभी ...   और पढ़ें...
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• चाँद का अचार

एक रात तन्हाई संग छत पर टहलने निकलीतो देखा आसमान के आँगन में चाँद का अचार रखा था माँ उसे उठाना भूल गई थीतो तारे उस पर लग गए थेमैं उसे उठाकर ले आईआँसुओं से धोया और सपने के छज्जे पर रख दिया जब कभी दोपहर बेस्वाद हो जाती थी चाँद का अचार चख लेती थी कभी कविता ...   और पढ़ें...
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• मैं बँट जाती हूँ

मुझे तलाश है एक ऐसे जहाँ की जहाँ मुझे अभिनय न करना पड़े रिश्तों के चरित्र में ढलकर, जहाँ मुझे बँटना न पड़े जैसे बँट जाते है कमरे एक ही घर के मैं जिस कमरे में जाती हूँ उस कमरे-सी हो जाती हूँ, थोड़ा बँट जाती हूँ सुबह की चाय के साथ चुस्कियों में, दोपहर के खाने ...   और पढ़ें...
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