श्रेणियाँ: बातें कुछ अनकही सी
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एक बार फिर मैं लौट आई हूँ देह समेत, और रूह का एक कोना फाड़ करइश्क के दरख़्त पर बाँध दिया है, मन्नत पूरी होने के इंतज़ार में..... और पढ़ें...
मुझे तलाश है एक ऐसे जहाँ की जहाँ मुझे अभिनय न करना पड़े रिश्तों के चरित्र में ढलकर, जहाँ मुझे बँटना न पड़े जैसे बँट जाते है कमरे एक ही घर के मैं जिस कमरे में जाती हूँ उस कमरे-सी हो जाती हूँ, थोड़ा बँट जाती हूँ सुबह की चाय के साथ चुस्कियों में, दोपहर के खाने ... और पढ़ें...