 विचलित मन की व्यथा को परिभाषित करने के लिए बहुत से शब्द होते हैं, लेकिन मन जब शांत हो तब उसको परिभाषित करना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि विचलित मन के लाँछनों को ढोने वाले शब्दों को पता होता है कि सुकून के पलों को उनकी इतनी जरूरत नहीं जितनी खामोशी की ... आगे पढ़ें...
|
तुम कैसे हो? मैं अच्छा हूँ? वो भी अच्छी है ना? हाँ फिर? फिर क्या? दो अच्छे लोग मिले, प्यार हुआ शादी की, फिर? वो पहले भी लड़की थी आज भी लड़की है। तो क्या हुआ प्यार तो अब भी है ना? मैं नहीं जानता अब कि प्यार किसे कहते है, इसलिए कह नहीं सकता कि प्यार है या ... आगे पढ़ें...
|
दिल से इक आह उठती हैऔर बरसों की भटकन एक पल को छूकर सुकून बन जाती है कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था जब मैंने तेरी ज़ुल्फों को छुआ था आगे पढ़ें...
|
|
|
 मैं उन्मादित हूँ पर नदी नहीं गहराई हूँ पर समन्दर नहीं तपती हूँ पर रेगिस्तान नहीं मैं रेगिस्तान में भटकते प्यासे की मरिचिका हूँमैं शोर हूँ पर शब्द नहीं इश्क हूँ हौसला नहीं खामोशी हूँ सुकून नहीं जिस पर आकर लहरें सूख जाती है मैं वो समेटा हुआ किनारा हूँवो ... आगे पढ़ें...
|
उनके पास जीवन है, विज्ञान है, ताकत भी हैउनके पास जोश है, ज्ञान है, नफरत भी है उनके पास प्यार है और परमात्मा भी है उनके पास पानी है और आग भी है उनके पास निर्जीव, सजीव दोनों दुनिया है मेरे पास सिर्फ एक देह, एक आत्मा और कुछ संवेदनाएँ हैं फिर भी वो नहीं जानते ... आगे पढ़ें...
|
|
|
बहुत अजीब सा ख्वाब था वो, कहीं दूर पहाड़ों पर, सफेद फूलों के बीच सुंदरता मुस्कुरा रही थी, सूरत में ताज़गी और सीरत में पवित्रता की लौ झिलमिला रही थी। मैं ज्यों-ज्यों उसकी तरफ बढ़ती वो हँसते हुए मुझसे दूर भाग रही थी। जब तक मेरे और सुंदरता के बीच में दूरी थी ... आगे पढ़ें...
|
|
|
|
|
|