 की-बोर्ड की खड़खड़ाहट ज़ेहन में अक्सर ट्रेन की रिदम के साथ गड़बड़ा जाती है बर्फ और अंगारे के बीचोबीच दबी दोपहर में फ़्लैश होती रहती हैं कम्प्यूटरों की हिलती खिड़कियाँ और अंतराल में सफ़ेद समय की एक पट्टी सेगुज़रते रहते हैंचेहरेमैं एक चेहरा अपने ... आगे पढ़ें...
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 मैं तुम हो जाऊँ तुम चाहो तो उग आऊँ कहीं आँगन में तुम्हारेया चाँद बनकर खड़ा रहूँ दरवाजे पर तुम्हारेचाहो तो नदी हो जाऊँ बहूँ तुम्हारे अंदर कहींहर लूँ परेशानीऔर दुख तुम्हारेहवा हो जाऊँ उड़ाऊँ आँचल तुम्हाराया धूप जिसमेंबच्चे खेलें तुम्हारेक्यों न ... आगे पढ़ें...
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 कल ही देखा कुछ बच्चे मिट्टी परअपने हाथों का निशान बनाकरउसमें रेखाएँ बना रहें थेफिर कही से हवा का झोंका आयाऔर हाथों पर बनी उन लकीरों कोकहीं-कहीं भर गया तो कहीं सेउसका रूख दूसरी तरफ कर दियाअचानक ख्याल आया काश!!हमारे हाथों की रेखाएँ सच मेंमिट्टी की ... आगे पढ़ें...
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 वैसे तो वह अकसर लोगों को हाथ मिलाकर हेलो करती है। लेकिन पता नहीं क्यों आज उसने जिस जिस से हाथ मिलाया, वे कुछ पल के लिए अपना हाथ टटोलने लगे। एक ने तो कह भी दिया ऐसा लग रहा है, हाथ से कुछ चुराकर ले जा रही हो। उसने भी यूँ ही मस्ती में कह दिया हाँ आपकी किस्मत ... आगे पढ़ें...
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 मेरी हथेलियों को छूकर कोई लफ्ज़ तेरे कानों में पड़ा हो तो उसे अपने होठों पर सजा लेनाआज की रात एक बिरहा का गीततेरे दर पर आएगा उसे वो लफ्ज़ लौटा देनाकल रात मेरे आँगन से गुज़रा था वो गीत और मेरे हाथों में अपना एक लफ्ज़ छोड गया थाआज की रात उसे पूरा कर ... आगे पढ़ें...
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कम्प्यूटर पर चलती उँगलियों के साथ बहुत कुछ साथ है, कानों में घुलता संगीत, टेबल पर कुछ किताबें रखी हैं, पुखराज, वर्जित बाग की गाथा, कुछ अटके कुछ भटके, इन सभी के साथ शोभा डे का एक मोटा सा अंग्रेजी नॉवेल भी है- सुपर स्टार्स ऑफ इंडिया........... ये सब मेरे ... आगे पढ़ें...
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 संवादों के पुल पर खड़े थे हम दोनोंऔर नीचे खामोशी की नदी बह रही थीन जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया...बहुत कठोर-सी वस्तु थी वह जो हमें एक-दूसरे के बीच अनुभव हो रही थी। गुस्से की आग, स्पर्श का कुनकुनापन, देह की अगन, ईर्ष्या ... आगे पढ़ें...
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 मैंने सपनों की सुई मेंईच्छा का धागा पिरोकरप्रकृति की चादर परतेरे सपने को आकार दिया हैडर है तो सिर्फ़ इस बात काकि तेरी चाहतों की चादर मेंकहीं मतलबी छेद न हो जाए।-गर्विता कौशल आगे पढ़ें...
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 सहरा की गर्म मिजाजी से परेशान एक रात लड़ती रही रातभरसुकून की ठंडी चादर का कोना थामे एक रात सिसकती रही रातभर चाँद खामोश-सा देखता रहा बादल के झरोखों सेतारों की मस्ती चलती रही रातभर शिकायतों की रेत थी जो आँखों में उड़ती रही वो दामन से सितारे झटकती रही ... आगे पढ़ें...
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 फिर से अइयो बदरा बिदेसीतेरे पंखों पे मोती जड़ूँगीभर के जइयो हमारी कलैयामैं तलैया के नारे मिलूँगीतुझे मेरे काले कमली वाले की सौंतेरे जाने की रुत मैं जानती हूँमुड़ के आने की रीत है कि नहींकाली दरगाह से पूछूँगी जाकेतेरे मन में भी प्रीत है कि नहींकच्ची पुलिया ... आगे पढ़ें...
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ज़िंदगी को यदि किसी इनसानी रिश्ते का नाम देना हो, तो आप किस रिश्ते को सबसे ज्यादा ज़िंदा मानते हैं? आगे पढ़ें...
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 समय की विपरित धारा में जैसे कृष्ण ने पूरा पर्वत अपनी एक उँगली पर उठा रखा था, मुझे लगता है मैंने भी अपनी दुनिया को उसी तरह एक उँगली पर उठा रखा है। जो आस्था और विश्वास का चौगा पहने उसके नीचे आता गया, मैं उसे अपने आँचल में छुपाती गई। मैंने उसे पूरे शिद्दत से ... आगे पढ़ें...
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ज़िंदगी को यदि किसी इनसानी रिश्ते का नाम देना हो, तो आपको सबसे ज्यादा ज़िंदा कौन लगता है? आगे पढ़ें...
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