अधिकतर को तो मैं जवाब ही नहीं देती क्योंकि मैं जानती हूँ उनकों मेरी बातें समझ ही नहीं आएंगी| उनके चारों ओर प्रतिपल चमत्कार घट रहे हैं, लेकिन उनमें उन चमत्कारों से चमत्कृत या अचंभित होने का साहस और शक्ति दोनों नहीं है| जो लोग जरा-सा भी समझ पाते हैं, जिनमें चमत्कारों को समझने और स्वीकारने का थोड़ा-सा भी साहस और शक्ति है, उनसे मैं यही कहती हूँ कि-
क्या मैं जानती थी कि बारह साल पहले मुझे ऐसे व्यक्ति से विवाह करना पड़ेगा जिसे भैया कहा करती थी, क्योंकि वे मेरे बड़े भाई के अति घनिष्ठ मित्र थे| कुछ परिस्थितियों के वशीभूत होकर और कुछ उम्र की नासमझी के कारण विवाह तो कर लिया पर मैं अपने मन में उनके प्रति प्रेम और पति भाव उत्पन्न न कर सकी, पर विवाह और समाज के नियमों का पालन भी करना था, इसलिए दो बेटियों का जन्म हुआ| चूंकि विवाह का आधार प्रेम होता है, हमारा वैवाहिक जीवन प्रेम के अभाव में तीन वर्षों के अंदर ही असफल हो गया, फिर जैसे एक छत के नीचे साथ रहना सिर्फ़ मजबूरी होता गया|
क्या मैं जानती थी कि मेरे इस विवाह के कारण मेरे माता-पिता मुझे हमेशा के लिए त्याग देंगे?
क्या मैं जानती थी कि इस दौरान मेरे जीवन में ऐसे कई मित्र आएँगे जो अकेले में तो मित्रता और प्रेम का नक़ाब ओढ़े मुझे प्रसन्न करते रहेंगे और दूसरों के सामने अजनबी की तरह पेश आएंगे ताकि उनके सामाजिक जीवन पर कोई आँच न आए| और ऐसे दोहरे मापदंडों वाले लोग समय आने पर न सिर्फ़ पीठ फेर कर चले जाएंगे वरन मेरे किसी साहसिक कदम पर दुश्मनों से भी गिरे स्तर पर आकर मेरी निंदा करेंगे? वे समझते हैं मुझे अनजाने नामों से टिप्पणियाँ भेजने पर मैं उन्हें पहचान न सकूँगी| लेकिन वे नहीं जानते कि ऊपर वाले ने मुझे एक ऐसी छठी इंद्रिय भी दी है जिससे मैं उन्हें न सिर्फ उनकी टिप्पणियों से पहचान लेती हूँ बल्कि यदि वे मेरे प्रति किसी दुर्विचार से ग्रसित होते हैं तब भी मुझे पता चल जाता है|
क्या मैं जानती थी कि मेरे प्रथम वैवाहिक जीवन से तंग आकर मैं वेबदुनिया की नौकरी छोड़ दूँगी?
क्या मैं जानती थी कि नौकरी छोड़ने के बाद मेरा जीवन और भी अधिक नर्क हो जाएगा और दोबारा मुझे वेबदुनिया में ही नौकरी करना होगी?
क्या मैं जानती थी कि वेबदुनिया दोबारा आने के बाद यहाँ मायवेबदुनिया के ब्लॉग्स के द्वारा मैं और मेरा जीवन इतना चर्चित हो जाएगा?
क्या मैं जानती थी कि मेरे ब्लॉग के कारण ही मेरा विनय से परिचय होगा? और जिसे कभी देखा नहीं उसे चार-पाँच महीने के ई-मेल और फोन पर हुए वार्तालाप के बाद एक दिन मुझे उनसे मिलाने उनके शहर भेज दिया जाएगा और वो भी बब्बा (ओशो) के जन्मदिन के दिन?
जब ये सब मेरे सोचे अनुसार नहीं हुआ तो फिर मैं ये कैसे सोच लूँ कि मैं अपनी बेटियों को छोड़ के आ गई हूँ या मैंने उन्हें खो दिया है?
ऊपर वाला चाहता था कि ऐसा कुछ हो, तो ऐसा हो रहा है... वो चाहता था कि मैं अपनी बेटियों से सिर्फ़ कुछ दिन अलग रहूँ तो रह रही हूँ... वो चाहता था कि इस बहाने लोगों के चेहरे पर चढ़ें हुए नक़ाब उतर जाएँ तो उतर रहे हैं... वो चाहता था कि मैं गृहस्थ जीवन की परेशानियों को 12 साल तक झेलूँ, तो मैंने झेली... वो चाहता था कि उसके बाद सन्यासी हो जाऊँ तो हो गई.... शैफाली से माँ जीवन शैफाली हो गई|
मुझे इसलिए कोई दुःख या पीड़ा नहीं होती कि मेरी बेटियाँ मुझसे दूर हैं| वो आज मेरे ज्यादा क़रीब हैं, इतनी क़रीब तो वो उन दिनों भी नहीं थी जब मेरे साथ थीं| इन कुछ दिनों की दूरियों के बाद जब हम मिलेंगे तो प्रेम का सागर उमड़ पड़ेगा और मन इसी बात से आनंदित हो रहा है कि उनके मेरे पास आ जाने का दिन बस आ ही गया है|
सब कुछ उसकी योजना के अंतर्गत हो रहा है और मैं खुद को भाग्यवान समझती हूँ कि मैं इस योजना का हिस्सा बनी|
तभी तो जब दो दिन पहले अपने बिस्तर पर आकर बैठी ही थी कि बब्बा की क़िताब अपने आप मेरी गोद में आकर गिर पड़ी और उस क़िताब में जिस जगह मैंने अपनी बेटी की तसवीर रख रखी थी वो पृष्ठ खोला तो बब्बा ने मुझे आश्वासन दिया -
"धीरे-धीरे जो बीज बोने शुरु किए थे, अंकुराने लगे हैं| धीरे-धीरे जो गंगोत्री की धार शुरु हुई थी - गैरिक गंगा बड़ी होने लगी है, गंगा बनने लगी है| दूर-दूर देशों तक गैरिक संन्यासी दिखाई पड़ने लगा है| कुछ होने को है| तुम्हें शायद पता भी न हो कि तुम किसी एक बड़े, महत आयोजन में हिस्सेदार हो, भागीदार हो| तुम्हें अपने सौभाग्य का भी शायद ठीक-ठीक पता न हो- किसी को कभी नहीं था|
मुझे पता है कि तुम एक विराट आयोजन के भागीदार हो रहे हो- अनजाने| तुम जो अपनी छोटी-सी ईंट रख रहे हो इस मंदिर में, यह किसी विराट मंदिर का हिस्सा बनेगी| तुम्हारी ईंट के बिना यह मंदिर उठ भी नहीं सकता| तुम्हारी ईंट कितनी ही छोटी हो, तुम्हारी ईंट अनिवार्य है| तुम धन्यभागी हो|"
फिर क्यों न मैं खुद को धन्यभागी, सौभाग्यशाली समझूँ? क्यों मैं, क्या खोया-क्या पाया के फेर में पडूँ? उसका है तो वो ले लेगा, वो देना चाहे जब चाहे दे दे| मैं तो बस निमित्त मात्र हूँ|
तभी तो बब्बा आगे कह रहे हैं- "प्रेम से बड़ी कोई शक्ति इस जगत में नहीं है| प्रेम से ही घूमती है पृथ्वी, प्रेम से ही चाँद तारे चलाते हैं| प्रेम के धागों से ही बंधा है अस्तित्व| तुम यहाँ हो प्रेम की अनंत धारा के कारण| तुम्हारे बच्चे यहाँ होंगे प्रेम की अनंत धारा के कारण|"
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