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आव्हान मंत्र
ध्यानं यासा पद्मासनस्था, विपुल कटि तटि पद्म पत्रायताक्षि,
गम्भीरावर्तनाभिः स्तनभारनमिता, शुभ्रवस्त्रोत्तरीयाः|
लक्ष्मी दिव्यै गजेन्द्रै स्नापिताः हेम कुम्भैः
नित्यं सा पद्महस्ता: वसतू मम गृहे सर्वमांगल्ययुक्ताः|
मंत्र-
ओं श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्मी लक्ष्म्यै सकल सौभाग्यम मे देहि स्वाहा|
इस मंत्र की गूंज अब तक मेरे कानों में हो रही है, पूरा कमरा हवन कुंड से निकल रहे धुएँ से भर गया है, जिसकी सुगंध मुझे मेरी देह और कपड़ों से ही नहीं, वरन आत्मा से भी आने लगी है| मैं चारों ओर से पवित्रता और दिव्यता से घिरी हुई हूँ| इस पवित्र सुगंध का एक-एक घूँट मेरी सांसों के जरिये मेरी देह में जा रहा है और मैं उसे रक्त में घुलता अनुभव कर रही हूँ|
नवरात्रि के नौ दिन तक इस मंत्र का जप किया, सुबह शाम दोनों समय और आज नवमीं के दिन हवन कर माँ के चरणों में माथा टिकाते हुए उसके आशीर्वादों की बौछारों के लिए अहोभाव प्रकट किया और मुझ माँ को अपनी बेटियों की प्रतीक्षा के लिए धैर्य और साहस दिया उसके लिए कृतज्ञता प्रकट की| सारी घटनाओं के सुखपूर्वक घटित होने के बावजूद भी दोनों बेटियों को जल्दी से मेरे पास भेज देने की प्रार्थना करने से खुद को रोक न सकीं|
मैं जानती हूँ उन दोनों की मेरे पास आने की तिथि नजदीक आती जा रही है और जैसे-जैसे एक एक दिन व्यतीत होता जा रहा है वैसे वैसे इस माँ का हृदय उन दोनों के यहाँ आने की यात्रा के प्रारंभ हो जाने के आनंद में झूमता जा रहा है|
नवरात्रि शुरु होने से पहले गणेशोत्सव के दौरान जब मैं रोज़ सुबह गणेश स्त्रोत पढ़ने के बाद
"ओं गं गणपतये वरवरद सर्वजनं में वशमानय स्वाहा
ये जप किया करती थी| और उन्हीं दिनों विनय ने गुरुदत्त द्वारा लिखित पुस्तक "भाग्य-चक्र" सुनाना आरंभ किया था| और मुझे बार-बार कहते थे कि हमें नवरात्रि शुरु होने से पहले यह पुस्तक समाप्त करना है|
नवरात्रि के दो दिन पहले ही ये पुस्तक समाप्त हो गई थी| जिसके अंत में देवी के इस मंत्र का ज़िक्र है गुरुदत्त को यह मंत्र एक तांत्रिक वैद्य श्री विजय राघवाचार्य ने देते हुए कहा था कि - "आपके मस्तिष्क पर मैंने कुछ देखा है और उससे मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ आप में सरस्वती की कुछ माया छिपी हुई है| नित्य प्रातः भवों के मध्य में ध्यान केंद्रित कर इनका पन्द्रह-बीस मिनट तक जप किया करो| इससे तुम्हारे मस्तिष्क में जो गाँठ पड़ी है, खुल जाएगी और तुम्हारे में लेटेण्ट (छिपी) शक्ति का प्राकट्य होने लगेगा|
श्री का अर्थ लक्ष्मी, ह्री का अभिप्राय दुर्गा और क्ली का अभिप्राय है सरस्वती|
इन तीनों को परमात्मा की विभूतियाँ माना जाता है| इसी कारण इन तीनों के नाम से पूर्व परमात्मा ऊं का स्मरण किया जाता है|
आशय यह है कि हे परमात्मा! मुझे तुम्हारी ये तीनों विभूतियाँ प्राप्त हो|
विनय चाहते थे कि मैं भी इस मंत्र का जाप करूँ| वे मुझे भी यही कहते हैं जो श्री विजय राघवाचार्य ने गुरुदत्त से कहा था|
विनय के शब्दों में- "मैं आपकी हदों को तोड़ना चाहता हूँ...... बस..... सचमुच..... कूदो, पूरा समंदर है सामने...... उड़ो, पूरा आकाश आपका है......
खुद को दोहरा रहा हूँ- "You are unaware of your potential", मैंने सचमुच पढ़ा है आपको, और डूब के, पूरी शिद्दत से पढ़ा है, उस स्तर से भी पढ़ा है जहां से आपने लिखा था .....पर अकसर उससे बहुत बहुत गहरे जा कर पढ़ सका हूँ क्योंकि है आपके लेखन में वो बात.......
मुंह पर चाहे कितना ही मजाक करता रहूँ पर फिर दोहराऊँगा .... "You are my Amitabh Bachchan" कितना और कितनों को तो पढ़ा है, so, it's very difficult to impress me but you did and you do and will always do."
ये बात सच है कि विनय से परिचय के पहले बहुत कुछ लिखा और लोगों ने खूब सराहा भी| उसके पीछे कारण भी तो था कि मैं खुद को तलाश रही थी और ये तलाश तड़प बना कर शब्दों में ढलती रही और जब विनय को पा कर खुद को पा लिया तो तलाश का अंत हुआ और तड़प का भी|
जीवन की नैया आनंद की मौज में हिलौरे मार रही है, जीवन में रोज़ चमत्कार घट रहे हैं....... अब मैं इस पहली पहली बार मिल रहे आनंद रुपी परमात्न्मा के दर्शन करूँ उसमें झूम झूम जाऊँ उसमें डूब जाऊँ या अपनी कलम चलाऊँ| फिर भी रोज़ घटने वाली घटनाओं को डायरी का रुप दे कर कुछ न कुछ लिख ही लेती हूँ| फिर चाहे रोज़ के कामों में घटने वाली कोई आम घटना हो या मेरे संन्यास
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