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मुक्ति





















मैं मुक्ति की आकांक्षा की परिणति हूँ
बूँद भर आँखों में
सागर को उड़ेल देने का स्वप्न,
और गज भर आँचल में
वृहद समाज के लांछनों को ढोने पर भी
उसके छूट जाने का
या फट जाने का संदेह
मुझे विचलित नहीं करता,
न ही रोकता है
मेरे पैरों को
जो शांत श्वासों की थाप पर
नृत्य करते हैं बेसुध हो कर|

मैं मुक्ति की आकांक्षा की परिणति हूँ.....
दो मुट्ठियों में
धरती और आकाश को भींचकर
और नाज़ुक से कंधों पर
संस्कारों में लपेटी परतंत्रता को ढोने पर भी
थक जाने का
या टूट जाने का संदेह
मुझे विचलित नहीं करता
न ही रोकता है
मेरी बाहों को
जो प्रकृति को समेट लेती हैं
जब पैर थिरकते हैं श्वासों की थाप पर|

मैं मुक्ति की आकांक्षा की परिणति हूँ....
जीवन और मृत्य के बिम्बों पर
आनंद के सूक्ष्म कणों को टिकाकर
और आत्मा की मिट्टी पर
देह के ऊग आने पर भी
पलीत नहीं होती
ना ही पतित होती है
जहां सारे संदेहों को द्वार मिलता है
समाधान का,
जहां से सारे द्वार खुलते हैं
मुक्ति के......

प्रतिक्रियाएँ

Re: मुक्ति
स्वयं को परतंत्र मानना या जानना ही मुक्ति की आकांक्षा बनता है | आप तो परतंत्र, पराधीन या अन्य साधारण नारियों की तरह परजीवी भी नहीं, तो फिर?
Re: मुक्ति
मैं यहां सिर्फ़ मैं होती तो शायद यह सवाल जायज था... मैं जब मैं कहती हूं तब सिर्फ़ मैं कहां होती हूं वो पूरी नारी जाति होती है जो कहीं न कहीं किसी न किसी परिस्थिति में अपनी स्वतंत्रता, अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही हैं......
Re: मुक्ति
ये आपका भ्रम है!!! कहीं कोई संघर्ष नहीं कर रहा...... हर नारी घुट रही है, सिसक रही है और दम तोड़ रही है...... सदियों से दबी कुचली आधी आबादी, मानव होने से भी डरने लगी है
Re: मुक्ति
सच है..... सब मेरी तरह खुशकिस्मत कहां है.... काश हर किसी के जीवन में कोई 'विघ्नकर्ता' आए और उन्हें अपने होने का एहसास दिलाएं, अपनी परम स्वतंत्रता को प्राप्त कराने की राह दिखाएं......
Re: मुक्ति
उठना तो स्वयं ही पड़ता है, जागना तो स्वयं ही पड़ता है, चलना तो स्वयं ही पड़ता है, किसी रहबर का इंतज़ार अक‍सर इंतज़ार ही रह जाता है या धोखा खाने का मौका..... सो, ख़ुद ज़िम्मेदारी और श्रेय लेने का साहस जुटाएं
Re: मुक्ति
सारे इंतज़ार ख़त्म हुए..... पूरी ज़िम्मेदारी के साथ उठ खडी हुई हूं..... अब चलें???????
Re: मुक्ति
सारे इंतज़ार ख़त्म हुए..... पूरी ज़िम्मेदारी के साथ उठ खडी हुई हूं..... अब चलें???????
Re: मुक्ति
ये ज़िम्मेदारियां ही तो बेडि‌यां बन जाती हैं..... हां अगर ज़िम्मेदारी से आपका आशय, स्वयं की ज़िम्मेदारी से है, अपने हर निर्णय, हर कृत्य, अपने हर विचार की ज़िम्मेदारी से है कि आपके साथ जो भी हो उसके लिए मात्र आप ही जिम्मेदार हैं, तो हार्दिक साधुवाद
Re: मुक्ति
ज़िम्मेदारी तो है एक मनुष्य के हाथ में जितनी हो सकती है.... जितना मेरे नाम कर्म होगा वो तो मुझे करना ही है और उसके परिणाम का दायित्व भी मेरा ही कहलाएगा.... लेकिन जितना दिखाई दे रहा है सच उतना ही तो नहीं है ना..... वो ऊपर बैठा जो मेरे जरिये करवा रहा है उसे मैं कभी नहीं भूलती.....
Re: मुक्ति
अगर उस ऊपर वाले को बीच में ला रही हैं तो आपकी ज़िम्मेदारी कैसी?या तो आप ही आप हैं या फिर वो ही वो .....
Re: मुक्ति
इस ज़मीं से आसमां तक मैं ही मैं हूं.......
Re: मुक्ति
मैं भी तो यही कह रहा हूँ .... या तो आप ही आप हैं या वो ही वो है....
Re: मुक्ति
मैं भी क्या करूँ जब खुद में झांक कर देखती हूँ तब भी वही दिखता है और जब उसे खोजती हूँ तो उसमें मैं ही दिखाई देती हूँ......
Re: मुक्ति
ये दुई की माया है मेम साब.....एक बार अद्वैत i.e. NOT TWO से परिचय हो गया फिर........
Re: मुक्ति
फिर????????????
Re: मुक्ति
http://naayika.mywebdunia.com/2009/02/02/1233556800000.html फिर इसी काया में मोक्ष
अस्वीकरण