सिर्फ़ औरत
मैं औरत थी, चाहे बच्ची-सी, और यह खौफ़-सा विरासत में पाया था कि दुनिया के भयानक जंगल से मैं अकेली नहीं गुज़र सकती, और शायद इसी भय में से अपने साथ के लिए मर्द के मुंह की कल्पना करना- मेरी कल्पना का अंतिम साधन था.....
पर इस मर्द शब्द के मेरे अर्थ कहीं भी पढ़े, सुने या पहचाने हुए अर्थ नहीं थे| अंतर में कहीं जानती अवश्य थी, पर अपने आप को भी बता सकने की सामर्थ्य मुझमें नहीं थी| केवल एक विश्वास-सा था कि देखूंगी तो पहचान लूंगी|
पर दूर मीलों तक कहीं भी कुछ दिखाई नहीं देता था|
और इस प्रकार वर्षों के कोई अड़तीस मील गुज़र गए|
मैं जब उसे पहली बार देखा.... तो मुझसे भी पहले मेरे मन ने उसे पहचान लिया| उस समय मेरी आयु कोई अड़तालीस वर्ष थी.....
यह कल्पना इतने वर्ष जीवित रही, और इसके अर्थ भी जीवित रहे- इस पर चकित हो सकती हूँ, पर हूँ नहीं, क्योंकि जान लिया है कि यह मेरे "मैं" की परिभाषा थी- थी भी, और है भी|
मैं उन वर्षों में नहीं मिटी, इसलिए वह भी नहीं मिटी.....
यह नहीं कि कल्पना से शिकवा नहीं किया, उस आयु की कई कविताएँ निरी शिकवा ही हैं, जैसे-
"लक्ख तेरे अम्बारां बिच्चों, दस्स की लभ्भा सान्नू
इक्को तंद प्यार दी लभ्भी, ओह वी तंद इकहरी...
(तेरे लाखों अम्बारों में से बताओ हमें क्या मिला
प्यार का एक ही तार मिला, वह भी इकहरा......)
पर यह इकहरा तार वर्षॉं के बीतने पर भी क्षीण नहीं हुआ| उसी तरह मुझे अपने में लपेटे हुए मेरी उम्र के साथ चलता रहा....
कई हादसे हुए पर कल्पना, जो मेरे अंगो की तरह मेरे बदन का हिस्सा थी, वह मेरे बदन में निर्लेप होकर बैठी रही....
उसे कई वर्ष समाज ने भी समझाया, और कई वर्ष मैंने स्वयं भी, पर उसने पलकें नहीं झपकायीं| वह कई वर्षों के पार उस वीरानगी की ओर देखती रही, जहां कुछ भी नजर नहीं आता था....
और जब उसने पलकें झपकायीं, तब मेरी उम्र को अड़तीसवां वर्ष लगा हुआ था.....
और तब... मैंने जाना.... कि क्यों उसे, उससे कुछ अलग, या आधा, या लगभग-सा कुछ भी नहीं चाहिए था|
यूं तो मेरे भीतर की औरत सदा मेरे भीतर के लेखक से दूसरे स्थान पर रही है..... कई बार यहां तक कि मैं अपने भीतर की औरत का अपने आपको ध्यान दिलाती रही हूं| 'सिर्फ़ लेखक' का रुप सदा इतना उजागर होता है कि मेरी अपनी आंखों को भी अपनी पहचान उसी में मिलती है|
पर ज़िंदगी में तीन वक्त ऐसे आए हैं, मैंने अपने अंदर की 'सिर्फ़ औरत' को जी भरकर देखा है| उसका रुप इतना भरा-पूरा था कि मेरे अंदर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गाया| वहां, उस समय, कोई थोड़ी-सी भी खाली जगह नहीं थी, जो उसकी याद दिलाती| यह याद केवल अब कर सकती हूँ- वर्षों की दूरी पर खड़े होकर|
मैं चौंककर पूछती थी- तू कहां था? मैं तुझे ढूंढती रही.....
और वह चेहरा हंस पड़ता था- "मैं यहीं था, छिपा हुआ था|"
और मैं जल्दी से गमले में से बच्चे को उठा लेती थी|
जब मैं जग जाती थी, मैं वैसी की वैसी ही होती थी, सूनी, वीरान और अकेली| एक "सिर्फ़ औरत", जो अगर माँ नहीं बन सकती थी, तो जीना नहीं चाहती थी|
और जब मैंने अपनी कोख से आए बच्चे को देख लिया, तो मेरे भीतर की निरोल औरत उसे देखती रह गई|
दूसरी बार ऐसा ही समय मैंने तब देखा था, जब एक दिन साहिर आया था, तो उसे हलका-सा बुखार चढ़ा हुआ था| उसके गले में दर्द था, सांस खिंचा-खिंचा था| उस दिन उसके गले और छाती पर मैंने "विक्स" मली थी| कितनी ही देर मलती रही थी, और तब लगा था, इसी तरह पैरों पर खड़े-खदे मैं पोरों से, उंगलियों से और हथेली से उसकी छाती को हौले-हौले मलते हुए सारी उम्र गुजर सकती हूं| मेरे अंदर की "सिर्फ़ औरत" को उस समय दुनिया के किसी काग़ज़-क़लम की आवश्यकता नहीं थी|
मेरे भीतर की इस "सिर्फ औरत" की "सिर्फ़ लेखक" से कोई अदावत नहीं| उसने आप ही उसके पीछे, उसकी ओट में खड़े होना स्वीकार कर लिया है- अपने बदन को उसकी आँखों से चुराते हुए, और शायद अपनी आँखों से भी, और जब तक तीन बार उसने अपनी जगह पर आना चाहा था, मेरे भीतर के "सिर्फ़ लेखक" ने पीछे हटकर उसके लिए जगह खाली कर दी थी|
- अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट से
एमी,
क्या ख़ुदा ने हम दोनों की किस्मत एक ही कलम से लिखी है? वही सपने, वही हकीकतें, वही किस्से और वही किस्मत.....
मोहब्बतें कब तक समाज के ठेकेदारों का मुंह तकती रहेंगी????
-शैफाली
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