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पॉईंट ब्लैंक शूट

दूसरा पक्ष


"मै एक इंसान हूं, मेरी भी कोई इच्छा- अनइच्छा है| यह बात मैं किसी को कैसे समझाऊं| पिताजी के अनुसार मैं अकेली रह कर खराब हुई जा रही थी| लोग बड़ी आसानी से स्त्रियों को 'खराब' की उपाधि दे देते हैं| खराब होना किसे कहा जाता है? पुरुष के साथ संपर्क होने से स्त्रियां खराब हो जाती हैं? लेकिन स्त्रियों के साथ पुरुष का किसी भी तरह का संपर्क पुरुष को तो खराब नहीं करता? स्त्रियों के चरित्र और चरित्रहीनता का मामला सिर्फ़ शारीरिक घटनाओं से तय किया जाताहै| कितना विचित्र नियम है!"

"मेरा शरीर पुरुष से भिन्न होगा ही, लेकिन इस भिन्नता के कारण मेरी सीमा क्यों बांध दी जाएगी, क्यों मेरी स्वतंत्रता पर आंच आएगी? मैं चाहती हूं कि मैं एक पूर्ण मनुष्य के रुप में अपनी शाखा-प्रशाखा चारों ओर फैला कर जीती रहूं| मेरा मन होता है कि अपने ऊपर से दूसरों का अकारण जताया गाया अधिकार उतार कर फेंक दूं| मेरा मन करता है, खूब मन करता है कि अकेले जी सकूं| इब्सन का वह कथन है न- The strongest man in the world is tha man who stand most alone. एक आदमी की इच्छा-अनइच्छा के आगे मेरे हाथ-पांव, मेरा सारा शरीर बंधा रहता है, ऐसा क्यों? इससे मुझे क्या लाभ है?"

"इस देश में कोई भी बच्चा अपनी माँ के नाम से नहीं जाना जाता, वह जाना जाता है अपने पिता के नाम से| स्कूल में भर्ती होने से ले कर नौकरी चाकरी, यहां तक कि रिटायर्ड होते समय भी पिता के नाम की ज़रूरत होती है| मां की नहीं| अब मैं खुद को धीरे-धीरे इंसान बना रही हूं| बहुत दिनों तक तो मैं रेंगनेवाले कीड़े की तरह जीवित रही| कितने दिनों तक रीढ़विहीन जीवन अच्छा लगता है?"


"पहली बात तो मैं कुंवारी नहीं, दूसरी सतीत्व की प्रचलित धारणा में विश्वास नहीं रखती| क्योंकि यह बड़े ही आलीशान ढंग से स्त्रियों पर आरोपित एक संस्कार है| मैं यदि आपने विवेक और बुद्धि से चलना सिख सकूं तो इसे ही मैं ज्यादा बेहतर समझती हूं| और जहां तक खाना-पीना, साफ़ सफाई आदि का काम जो स्त्रियों के लिए अलग से तय कर दिया गया है मुझे लगता है यदि परिवार दोनों का है तो यह भी दोनों को मिल कर करना चाहिए| घर की बहुएं दरअसल एक तरह की दासियां ही होती हैं- साफ-सुथरी, सुशील दासी| जिससे खाना भी बनवाया जा सकता है, बिस्तर में ले कर सोया भी जा सकता है, और बाहर के लोगों के सामने मान-सम्मान की रक्षा भी होती है| "


"मैं दिन-ब-दिन बहुत साफ़ होती जा रही हूं| शायद इसी जगह पर पहुंचने के लिए ऊबड़-खाबड़ रास्तों वाले लंबे कष्टपूर्ण जीवन का सफर मैं तय कर आई| मुझे अभी भी लगता है, मेरी मंज़िल यही है| यहां आ कर स्थिर खड़ी होऊँगी इसीलिए मेरे पिछले जीवन में इतनी भयानक अस्थिरता थी| कितनी बड़ी गलतफहमी के बीच मैं रह रही थी| सोच रही थी मुक्ति शायद सामूहिक जीवन से आती है| मुक्ति शायद सिर्फ़ प्यार से ही संभव है| जो समाज स्त्री को पुरुष के शासन और शोषण के बीच रख कर बड़े होने को आदर्श मानता है, जिस समाज में स्त्री-पुरुष के प्राक्-विवाह सम्बन्ध को प्यार समझा जाता है| दरअसल, प्यार का हम लोग गलत मतलब निकालते हैं| पुरुषगण स्त्री के मन और शरीर को अपने अधीन रखना चाहते हैं और स्त्री भी इसीलिए पुरुष की मर्जी से बलिवेदी पर अर्पित होना चाहती है| चाहे और कुछ भी कहें मैं उसे प्यार नहीं कहती| किसी को बंधन में जकड़ने का नाम प्यार नहीं है| "

नूपुर,

हुमायूं मेरे दफ्तर में लगभग सबसे कह चुका है कि मेरे पेट में उसका बच्चा नहीं है| मकान मालिक के यहां भी जा कर बात ही बात में यह कह आया है कि जो बच्चा जन्म लेगा, वह उसका नहीं है| अपने रिश्तेदारों से जा कर कहा है कि एक चरित्रहीन लड़की से शादी कर के उसने बहुत बड़ी भूल की है, बहुत जल्द मुझे तलाक दे देगा|

इस बार तलाक के कागजात पा कर मैं पहले की तरह निर्लिप्त नहीं रहूंगी| उस बार गाना गा रही थी, ' ओ गो उत्तल हवा', इस बार गाना नहीं गाऊंगी, मैं ज़ोर-ज़ोर से अट्टाहस करूंगी|

मकान मालिक की बीवी आई थी, कल रात में| आंखें माथे पर चढ़ा कर मुझसे बोली - आपके साहब तो क्या सब कह रहे हैं, बच्चा क्या तो उनका नहीं है| मैं दफ्तर के कागज़ों में डूबी थी, नज़रें उठकर बोलीं बच्चा मेरा है, मेरा है इसलिए शायद उसे पसंद नहीं आ रहा, रूबी आपा| लड़कियां तो किसी भी चीज को अपना कह कर नहीं जानती| मैं ही थोड़ा जान लूं| मैं किसी का खेत नहीं हूं कि कोई अपनी इच्छा से जो चाहे खेती करे, जब चाहे फ़सल काटे| कहते हुए मैं उत्तेजित हो गई| रूबी आपा चली गईं|

शायद दफ्तर में भी कुछ परेशानियां बढ़ेंगी, घर भी बदलना पड़ सकता है| यह वैसे क्या तकलीफ है| तकलीफ झेलने की तो मेरी आदत है| लोग बुरा-भला कहेंगे? लोग तो हमेशा ही बुरा- भला कहते हैं| लोगों की बातों से क्या होता है, बोलो? लड़कियों के घर के बाहर कदम रखते ही लोग बुरा-भला कहते हैं, तो क्या इसके लिए लड़कियां बाहर निकालना बंद कर देंगी?
नूपुर, तुम चली आओ, मेरे अन्दर का इंसान हाथ-पांव मार रहा है| तुम कान लगा कर इसके खेलने की आवाज़ सुनो| चारों ओर सिर्फ़ घृणा, घृणा और घृणा| तू इसे प्यार के दो बोल सुना जा|

- यमुना

तसलीमा नसरीन द्वारा लिखित कहानी "दूसरा पक्ष" का ये अंतिम पत्र है, जो कहानी की नायिका 'यमुना' अपनी छोटी बहन नूपुर को लिखती है| दो बहनों के बीच पत्राचार के माध्यम से तसलीमा ने न सिर्फ़ दो औरतों के जीवन को चरितार्थ किया है, बल्कि उन दो औरतों के मार्फत समाज के तथाकथित नियमों पर सीधा प्रहार किया है| जो बातें पुरूषॉ के लिए सही है वही बातें औरतों के लिए सिर्फ़ गलत ही नहीं गुनाह करार दी जाती है| और इस भेदभाव के खिलाफ उठाएँ किसी औरत के कदमों के आगे जो कांटे बिछाए जाते हैं, उसको निकालने में औरत के दामन पर कितने दाग लग जाते है, इस बात का वर्णन करते हुए तसलीमा जब उपरोक्त बातें लिखती हैं, तो लगता है उसकी कलम में न जाने कितनी सदियों से दमन का शिकार हो रही औरतों की टीस गूंज रही है|

बल्कि ऐसी सटीक बातों को बेधड़क लिखने वालों के हाथों में कलम नहीं होती, रिवॉल्वर होती है, जो पॉईंट ब्लैंक शूट करती है| जहां निशाना चुकने की गुंजाईश नहीं बचती| "दूसरा पक्ष" के मार्फत ऐसा ही निशाना तसलीमा ने समाज पर लगाया है, उस समाज पर जहां औरत के अन्दर जन्म ले रही अधिकारबोध की भावना को पुरुष पैरों से कुचलने के बाद भी समाज में अपनी छवि को बेदाग बने रखने में सफल हो जाते हैं|


नायिका ('शैफाली')



शहद का चांद



प्रतिक्रियाएँ

Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
ek puruSh hote hue mere liye kuch bhi kahna shayad sahi nahi hoga phir bhi kahta hoon ki Tasleema ji ne jaayaj baat kahi hai
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
यह सब बकवास है और अपने निर्ल्ज्ज चरित्र को ढकने की नाकाम कोशिश है.. कई मर्दों के साथ सो कर आपने को आज़ाद मानने वाली औरत तो मर्दों के लिए सबसे बड़ा खिलौना होती है| शादी और सतीत्व परंपराएँ है जिनके लिए अब तक हजारों देवीयों ने अपनी जान तक दे दी.. सीता के इस देश में तस्लीमा औरा अमृता प्रीतम जैसी कुछ नासमझ औरतों ने आप जैसी महिलाओं को आपने पाप जस्टीफाई कराने के लिए मसला दे दिया है और कुछ नहीं.....
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
सीता के इस देश में दशरथ की तीन रानियां भी थी, तो क्या दशरथ के चरित्र पर भी उंगली उठाई जा सकती है? क्या मर्यादा पुरुषोत्तम राम एक चरित्रहीन व्यक्ति के पुत्र थे? एक चरित्रहीन व्यक्ति के बेटे को मर्यादा पुरुषोत्तम की उपाधि क्यों दी गई?
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
सच कहा शेफाली, चरित्र की ये परिभषा सिर्फ़ औरत के लिए ही बनाई है समाज ने? 'सतीत्व' जैसा कोई शब्द मर्द के लिए क्यों नहीं बनाया गया? उनको शुरु से ये छूट दी गई कि वो चाहे जितनी औरतों से संपर्क रखें उनका चरित्र खराब नहीं होता|
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
शादी और सतीत्व परंपराएँ है जिनके लिए अब तक हजारों देवीयों ने अपनी जान तक दे दी.. .........(आप जैसे लोगों की यही सोच ने औरत को जान देने के लिए मजबूर किया, औरत को हमेशा से खिलौना समझा, क्यों हर बार औरत जान दे, क्यों बराबरी का हक पाने के लिए लड़ाई न लड़ें? क्यों उस सड़ चुकी शादी की परंपरा के हाथों बलि चढ़ती रहे? क्यों हमेशा अच्छी आदर्श औरत का मुखौटा पहने एक बंधक बनकर जिएं? क्यों औरत के स्वतंत्र अस्तित्व पर आप जैसे मर्दों को आपत्ति होती है? क्योंकि यदि औरत गुलामी बर्दाश्त नहीं करेंगी तो आप जैसे मर्द हुकुम किस पर चलाएंगे?
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
Jis Amrita Pritam ki aap baat kar rahe hai, unhone jab apane pati ka ghar chhoda tha tab un par bhi samaj ne yahi ilzaam lagaye honge, aap lagaa rahe hai to koi naya kaam nahi kar rahe, purush hamesha se yahi karta aaya hai aur karta aayega. Aur fir unki maut ke baad Imroz ke sath unke prem ko aadhyatmik prem ka darja diya. Aaadmi yahi to karta hai jab jina chaahta ho koi to use jine na do aur marne ke baad phulo ki mala pahnaa kar use mahaan banaa dete hai.
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
भाई मेरे जब इतना हि बहादुर बन रहा है तो नाम लिखने में क्यों नानी दादी याद आ रही है, अपना नाम तो बता, हम भी तो देखें कि हमारी बिरादरी में ये बहादुर मर्द कौन है? फिर मिल कर लड़ते हैं|
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
वाह मेरे मिट्टी के शेर,एक बात बता तेरी बीबी या बहन या माँ यह हरकत करें तब क्या करेगा... और एक बात इन सभी समझदार औरतों को जो पुरुषों को शासक कह ख़ुद को गुलामी की जंजीर तोड़ नायिका समझती है समझाना चाहता हूँ कि बुराई तो वैश्या में भी नहीं होती क्योकि वह किसी को धोखा नहीं देती बल्कि उसकी मानसिक गंदगी साफ़ कर उसकी शारीरिक जरूरतों को पूरा करती है | मेरा मतभेद सिर्फ़ उन औरतों से है जो शाडी किसी से करती है और उसी की छत के नीचे तब तक रहती है जब तक उनकों उनके टाइप का मर्द ना मिल जाएँ और आपकी नायिका का यह पहला प्रेम नहीं है... इसके पहले अपने पति को धोखा देती रही है यह खलनायिका.... मैं इसके पूर्व पति अजय का दोस्त हूँ अपने दोस्त के साथ हुई बेवफ़ाई देख इस नायिका (खल) का असली चेहरा आपके सामने लाना चाहता हूँ| हो दम तो इस कमेंट को ऑनलाइन करें तब इस बारे में और भी बातें लिखी जाएगी... और अगर पति से इतना झगड़ा था त्बा तो समझ आता पर मासूम बच्चीयों ने क्या बिगड़ा था कभी पता किया है उनका हाल्.... क्या उनकों ब्लॉग या इंटर्नेट पढ़ाना आता है... छोड़ दिया उनकों भूखे समाज के आगे...
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
हिजड़े, इस नायिका ने तो अपना दम दिखा दिया, अब तू भी तो अपने नकाब को हटा डरपोक और बता अब अपना नाम धाम, 7 महीने में हिम्मत नहीं जुटा पाया? - शेर (मिट्टी का नहीं)
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
तस्लीमा औरा अमृता प्रीतम जैसी कुछ नासमझ औरतों ने आप जैसी महिलाओं को आपने पाप जस्टीफाई कराने के लिए मसला दे दिया है और कुछ नहीं..... You mean to say Taslima and Amrita are not good women? then why are they still getting awards for their writing?
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
kis justification ki baat kar rahe hai aap ??? justification to bhagwaan ram ne bhi maanga tha Sita se jab wo Lanka se lauti thi..Sita ko bhi agni-pariksha deni padi thi & us agni pariksha mai kya hua ye to hum sab jaante hai.. So Mr. Anonymus ji ab mai aap se puchna chahti hu ki Sita ne kaun sa paap kiya tha ?? Ram bhi ek purush hi the jisne apni patni ko paapi samjha... Pursho ki soch hi itni ghatiya aur simit hoti hai ki wo is se jada kuch soch hi nahi paate Par ye yaad rakhna ek purush bhi ek stri ki hi den hai..Kya aap ise bhi PAAP kahenge ya justification samjhenge ??
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
u r wright.
Re: पॉईंट ब्लैंक शूट
सलाम - यार कितनी तकलीफों का समंदर भीतर छुपाये जी रही हो. तुम्हारी हिम्मत को सलाम्. ताकत तुम्हें ये शब्द ही देंगे औरतुम्हारा बुलंद हौसला.