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गृह प्रवेश

गुलज़ार साहब








लोगों के घर में रहता हूँ
कब अपना कोई घर होगा
दीवारों की चिंता रहती है
दीवार में कब कोई दर होगा

सब्जी मंडी बाप का घर
पुलबंगश पे मामा का
श्याम नगर में चाचा का
चौक पे अपनी श्यामा का

मायके और ससुराल के आगे
और भी कोई घर होगा
लोगों के घर में रहता हूँ...

इच्छाओं के भीगे चाबुक
चुपके-चुपके सहता हूँ
दूजे के घर यूँ लगता है
मोज़े पहने रहता हूँ





नंगे पाँव आँगन में
कब बैठूँगा, कब घर होगा
लोगों के घर में रहता हूँ
कब अपना कोई घर होगा

- गुलज़ार साहब

प्रतिक्रियाएँ

Re: गृह प्रवेश
आपका ब्लोग पढकर अच्छा लगा | ईस का हर शब्द दिल को छू लेने वाला है|
Re: गृह प्रवेश
na jaane mera ghar kab hoga......
Re: गृह प्रवेश
आओ...... आओ..... आओ...... मेरे बच्चों....... अपना गृह प्रवेश तुम्हारे बिना संभव नहीं......
अस्वीकरण