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दिसंबर 2008


ब्लॉग्स (4)

यथार्थ से यथार्थ तक - (रसीदी टिकट से)आत्मकथा को प्राय: चमकती-दमकती एकांगी सच्चाई समझा जाता है, आत्मश्लाघा का कलात्मक माध्यम, पर बुनियादी सच्चाई को लेखक की अपनी आवश्यकता मानकर मैं कहना चाहूँगी, यह यथार्थ से यथार्थ तक पहुँचने की प्रक्रिया है। एक कुछ वह होता ... आगे पढ़ें...

लोगों के घर में रहता हूँ कब अपना कोई घर होगा दीवारों की चिंता रहती है दीवार में कब कोई दर होगा सब्जी मंडी बाप का घर पुलबंगश पे मामा का श्याम नगर में चाचा का चौक पे अपनी श्यामा का मायके और ससुराल के आगे और भी कोई घर होगा लोगों के घर में रहता हूँ... इच्छाओं ... आगे पढ़ें...