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डिक्‍शनरी में जिस चेहरे का मतलब नहीं मिलता...

तुम्‍हारा बच्‍चों जैसा निरापद चेहरा - सुशोभित (चाकू समय)










की-बोर्ड की खड़खड़ाहट ज़ेहन में अक्‍सर
ट्रेन की रिदम के साथ गड़बड़ा जाती है
बर्फ और अंगारे के बीचोबीच दबी
दोपहर में फ़्लैश होती रहती हैं
कम्‍प्‍यूटरों की हिलती खिड़कियाँ
और अंतराल में सफ़ेद समय
की एक पट्टी से
गुज़रते रहते हैं
चेहरे

मैं एक चेहरा अपने कम्‍प्‍यूटर की स्‍क्रीन पर टाइप करता हूँ

और फिर ढूंढ़ता हूँ एक नाम
बच्‍चों जैसे निरापद चेहरों की पांत में
एक, दो, तीन के बाद भूल जाता हूं गिनती
टेबल पर रखी डिक्‍शनरी में
कुछ भी नहीं मिलता
तुम्‍हारे नाम का
मतलब तो
क़तई नहीं

तुम्‍हें देखता हूं आते हुए और
जाते हुए स्‍कूटर की
पिछली सीट पर
कंधे पर झूलते
बैग के साथ
सीढि़यों पर सुनता हूं
सैंडिल हील की खट-खट
जिसके ठीक बाद रिसेप्‍शन की टेबल पर
दर्ज करना होता है वह वक्‍़त
जो शायद उम्र के फैलाव में
कहीं भी न मिले
रजिस्‍टर पर मुकम्‍मल
दस्‍तख़त के बावजूद

तुम्‍हें देखता हूं गुज़रते हुए रोज़ दिन में दसियों दफ़े
सफ़ेद समय की उसी एक पट्टी से
और बस तुम्‍हारे लिबास का रंग
बदलता रहता है
मद्धम नहीं पड़ती
एसी की सरसराहट
न बुझती है कभी
दिन की भट्टी
इतने राख वक्‍़त में

कम्‍प्‍यूटर की स्‍क्रीन पर ख़ूब प्‍यार के साथ
टाइप करना चाहता हूं एक ठंडी दोपहर

ज‍बकि डिक्‍शनरियों के कोरे पन्‍ने हवा में उड़ते हैं
और ट्रेन की खिड़की में बार-बार कौंधता है
तुम्‍हारा निरापद चेहरा परछाइयों में बुझता हुआ! - सुशोभित (चाकू समय)

प्रतिक्रियाएँ

Re: डिक्‍शनरी में जिस चेहरे का मतलब नहीं मिलता...
maja aa gaya. dhanyawad.
अस्वीकरण