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मैं तुम हो जाऊँ

नवीन (मोक्ष)


मैं तुम हो जाऊँ



















तुम चाहो तो उग आऊँ कहीं
आँगन में तुम्‍हारे

या चाँद बनकर खड़ा रहूँ
दरवाजे पर तुम्‍हारे

चाहो तो नदी हो जाऊँ
बहूँ तुम्‍हारे अंदर कहीं
हर लूँ परेशानी
और दुख तुम्‍हारे

हवा हो जाऊँ
उड़ाऊँ आँचल तुम्‍हारा
या धूप जिसमें
बच्‍चे खेलें तुम्‍हारे

क्‍यों न किताब हो जाऊँ
और सिरहाने पड़ा रहूँ
रात भर तुम्‍हारे

क्‍या जरूरी है कि
मैं
मैं ही रहूँ
प्रेम करने, पाने
या खोने के लिए...... - नवीन (मोक्ष)

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