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26 जून, 2008


ब्लॉग्स (2)
की-बोर्ड की खड़खड़ाहट ज़ेहन में अक्‍सर ट्रेन की रिदम के साथ गड़बड़ा जाती है बर्फ और अंगारे के बीचोबीच दबी दोपहर में फ़्लैश होती रहती हैं कम्‍प्‍यूटरों की हिलती खिड़कियाँ और अंतराल में सफ़ेद समय की एक पट्टी सेगुज़रते रहते हैंचेहरेमैं एक चेहरा अपने ... आगे पढ़ें...

मैं तुम हो जाऊँ तुम चाहो तो उग आऊँ कहीं आँगन में तुम्‍हारेया चाँद बनकर खड़ा रहूँ दरवाजे पर तुम्‍हारेचाहो तो नदी हो जाऊँ बहूँ तुम्‍हारे अंदर कहींहर लूँ परेशानीऔर दुख तुम्‍हारेहवा हो जाऊँ उड़ाऊँ आँचल तुम्‍हाराया धूप जिसमेंबच्‍चे खेलें तुम्‍हारेक्‍यों न ... आगे पढ़ें...