Webdunia: Portal - Search - Mail - Greetings   More >>
Support | Font Download | Feedback
Search  
Welcome, Guest  [ Register | Sign In ]

तुझसे बिछड़कर.....















मेरी हथेलियों को छूकर
कोई लफ्ज़ तेरे कानों में पड़ा हो
तो उसे अपने होठों पर सजा लेना
आज की रात एक बिरहा का गीत
तेरे दर पर आएगा उसे वो लफ्ज़ लौटा देना
कल रात मेरे आँगन से गुज़रा था वो गीत
और मेरे हाथों में अपना एक लफ्ज़ छोड गया था
आज की रात उसे पूरा कर देना.............

प्रतिक्रियाएँ

Re: तुझसे बिछड़कर.....
आज की रात एक बिरहा का गीत ... तेरे दर पर आयेगा ... बहुत अच्छी लाईन है ...
Re: तुझसे बिछड़कर.....
यह पक्तिया मन को छूती हैं
Re: तुझसे बिछड़कर.....
तेरा वो लफ्ज़ होठों से होकर मेरे आंखो में उतरा है, कल रात मेरे आंगन के पानी में मिलकर वो तेरी गली को चला है....
Re: तुझसे बिछड़कर.....
अमृता प्रीतम, इमरोज़, साहिर. आज इमरोज़ ही हैं. कल????.... अमृता की एक कहानी दो भागो मे है - 'तेरहवा सूरज' और 'उनचास दिन'. ज़रूर पढ़ें.
Re: तुझसे बिछड़कर.....
दर बदर भटकते लफ्ज़....... बहुत अच्छा.
Re: तुझसे बिछड़कर.....
खूबसूरत कविता है. दिल को छू गई.
Re: तुझसे बिछड़कर.....
5 महीने 12 दिन हों गये..... इस 'कल?' का मतलब समझ आया??
अस्वीकरण