
संवादों के पुल पर खड़े थे हम दोनोंऔर नीचे खामोशी की नदी बह रही थीन जाने कौन-सा शब्द बहुत भारी हो गया कि जब चलने को हुए तो पुल टूट गया...बहुत कठोर-सी वस्तु थी वह जो हमें एक-दूसरे के बीच अनुभव हो रही थी। गुस्से की आग, स्पर्श का कुनकुनापन, देह की अगन, ईर्ष्या ...
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