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एक रात रातभर......












सहरा की गर्म मिजाजी से परेशान
एक रात लड़ती रही रातभर

सुकून की ठंडी चादर का कोना थामे
एक रात सिसकती रही रातभर

चाँद खामोश-सा देखता रहा बादल के झरोखों से
तारों की मस्ती चलती रही रातभर

शिकायतों की रेत थी जो आँखों में उड़ती रही
वो दामन से सितारे झटकती रही रातभर

आसमान बाँहें फैलाए खड़ा था शाम से
वो भीगी रात को निचोड़ती रही रातभर

दरवाजे पर खड़ा था उम्मीदों का आफताब
और वो खिड़की से झाँकती रही रातभर

आ अब के दिन निकल आया है और उजाला साथ लाया है
तेरे दामन में रोशनी बुनेंगे रातभर........


प्रतिक्रियाएँ

Re: एक रात रातभर......
क्या बात है ! बहुत खुब
Re: एक रात रातभर......
एक अच्छी बनती कविता को कुछ पंक्तियां कैसे बर्बाद कर सकती हैं इसकी एक छोटी-सी मिसाल है आपकी यह कविता। सहरा की गर्म मिजाजी से लेकर सुकून की ठंडी रात वाली पंक्तियां अकेलेपन औऱ अवसाद की चादर बुनती है। चांद खामोश... औऱ तारों की मस्ती वाली पंक्तियां इस चादर में दुःख का रंग औऱ चटख करती हैं, वह उभर कर आता है। फिर आसमान बांहे फैलाए... और वह भीगी रात को निचोड़ती रही रातभर वाली पंक्तियां इस पूरी कविता को यहां से एक तीसरा आयाम देती है जिसमें इंतजार, गुस्सा औऱ दुःख शायद तीनों घुले-मिले हैं। इसके बाद वाली पंक्तियां तो और भी मार्मिक हैं जिसमें सीने को चीरती एक विडंबना को बहुत खूबी से एक दृश्य में बांधा गया है। दरवाजा, उम्मीदो का आफताब से लेकर खिड़की, झांकना औऱ रातभर जैसे सुंदर शब्दों से फूटते भाव इस कविता को चरम पर ले जाकर मेरे जैसे पाठक को एक अव्याख्येय पीड़ा में अकेला छोड़ आते हैं। यह आपकी कविता की सबसे खूबसूरत पंक्तियां हैं औऱ पूरी कविता जो भाव-भूमि तैयारी करती है उस पर यह दो लाइनें वेदना एक अदेखा पुष्प पल्लवित कर जाती हैं। लेकिन आखिरी की दो पंक्तियां जैसे इस वेदना के पुष्प को नोच नोच लेती हैं औऱ सारी कविता की सारी खूबसूरती पंखुरी पंखुरी बिखर जाती है। ये आपने क्या कर दिया। आखिरी की निहायत ही चलताऊ किस्म की आमफहम आशावादी पंक्तियां इस पूरी कविता को इस कदर पतला कर देती हैं कि स्वाद तुरंत तुरा-तुरा हो जाता है। आखिरी की दो पंक्तियां नहीं होती तो यह कविता, कविता होती।
Re: एक रात रातभर......
मेरी कविता का इतना सुंदर भाव शायद आज तक किसी ने नहीं निकाला होगा| आप एक कवि के हृदय के उस तार तक पहुँचे हैं, जहाँ तक खुद कवि भी दोबारा नहीं पहुँच पाता| आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ, एक कवि की दृश्टि से मेरी कविता आखिरी दो पंक्तियों के पहले ही खत्म हो जाती है| शुक्र है मैं सिर्फ एक कवि नहीं.... यह कविता अपनी एक दोस्त के दर्द को बयाँ करने के लिए लिखी थी, और कविता की आखिरी पंक्ति तक आते आते मैं कवि से एक दोस्त बन गई और उस दर्द से भरी रात को नई सुबह के स्वागत का अंदाज सीखाने लगी.... बस आखिरी दो पंक्तियाँ दुख की रात से सुख के सवेरे तक पहुँचने का रास्ता है....
Re: एक रात रातभर......
वाह लाजवाब है।
Re: एक रात रातभर......
यदि एक कवि या आशिक की तरह सोचें तो लगता है उसके लिए सुख के सवेरे का कोई मायने नहीं। यदि कवि या उसे आशिक कह लें तो रात ही उसके लिए सुबह है जिसमें उसका सूर्य अपनी लालिमा के साथ आकार लेता है औऱ यदि वह दिन में है तो उसमें चंद्रमा अपने पूरे शबाब पर होता है। हम क्यों किसी को सुख के सवेरे का रास्ता दिखाएं, उसे वहीं क्यों नहीं खड़ा रहने दें, गहराती रात में खिड़की से झांकता हुआ, अपने दुःख में थरथराता हुआ, एकटक कहीं निहारता हुआ, किसी तारे की टिमटिमाहट में सुबह का उजाला ढूंढ़ता हुआ...
Re: एक रात रातभर......
वो कोई अजनबी होता तो शायद उसे वहीं अकेला छोड़ नई सुबह के स्वागत में दरवाजे पर खड़ी हो जाती........ कोई अपना रात के घोर अंधेरे में सहमा सा खड़ा हो और रोशनी का सामना करने से डर रहा हो तो मै सबसे पहले उस अपने के अंदर हौंसला जगाउँगी उसके बाद ही सूरज को अंदर आने दूँगी ......
Re: एक रात रातभर......
अपन को बहुत अच्छी लगी ये कविता. क्यों हम आशा के दीप नहीं जला सकते कविता में? क्यों रात के बाद हम सुबह का इंतजार नहीं कर सकते ?
Re: एक रात रातभर......
कविता सिर्फ इसलिए है कि हम है - यह व्याकरण की बात नहीं। अच्छी है।
Re: एक रात रातभर......
एक लंबी रात के बाद उम्मीद की सुबह आती है..... पर दर्द की रात कुछ ज्यादा लंबी होती है... और उससे भी लंबा होता है सुबह का इंतजार...............
Re: एक रात रातभर......
अगर सुबह का मज़ा लेना है तो इंत्ज़ार करो, कुंकि अधपकि हुई चीज़ मैं खुशबू नहीं होती.........
Re: एक रात रातभर......
यह बात सही इंतजार के बाद सुबह मोति जय् से!!!!!!!
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