
सहरा की गर्म मिजाजी से परेशान
एक रात लड़ती रही रातभर
सुकून की ठंडी चादर का कोना थामे
एक रात सिसकती रही रातभर
चाँद खामोश-सा देखता रहा बादल के झरोखों से
तारों की मस्ती चलती रही रातभर
शिकायतों की रेत थी जो आँखों में उड़ती रही
वो दामन से सितारे झटकती रही रातभर
आसमान बाँहें फैलाए खड़ा था शाम से
वो भीगी रात को निचोड़ती रही रातभर
दरवाजे पर खड़ा था उम्मीदों का आफताब
और वो खिड़की से झाँकती रही रातभर
आ अब के दिन निकल आया है और उजाला साथ लाया है
तेरे दामन में रोशनी बुनेंगे रातभर........

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