विचलित मन की व्यथा को परिभाषित करने के लिए बहुत से शब्द होते हैं, लेकिन मन जब शांत हो तब उसको परिभाषित करना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि विचलित मन के लाँछनों को ढोने वाले शब्दों को पता होता है कि सुकून के पलों को उनकी इतनी जरूरत नहीं जितनी खामोशी की है।
मन उदास नहीं खामोश है, उदासी और खामोशी में फर्क होता है। उदासी दुख की परछाई लिए होती है और खामोशी में न सुख होता है न दुख। उदासी को आप शब्द देकर भर सकते हैं, खामोशी में चाहे जितने शब्द भर दो, वो फिर भी खामोशी ही रहेगी।
उदास मन के पास कई चेहरे होते हैं, खामोश मन के पास कोई चेहरा नहीं होता, जो सामने आ जाए उसके आकार से गुजरकर फिर निराकार हो जाता है।
खामोशी को शब्द देना आसमान को बाँहों में भर लेने जैसा है, उदासी को शब्द देना सूखी लहरों में पानी भर देने जैसा है। सबसे खूबसूरत गीत उदासी में बनता है और सबसे अलौकिक गीत खामोशी से निकलता है। लेकिन इसका ये अर्थ बिलकुल नहीं कि खामोशी सिर्फ अलौकिक होती है, मैंने एक देहिक स्पर्श से भी खामोशी के गीत को जन्म लेते देखा है।
मन खामोश है, लेकिन ये खामोशी गुनगुना रही है कायनाती गीत जो अलौकिक होते हुए भी जीवन के हर पल, और उसकी दी हुई हर चीज को भोगने के लिए आतुर है। इस गीत में जीवन देह नहीं, देह एक जरिया है, जीवन को प्रवाहमान बनाए रखने के लिए।
देह की जरूरत सिर्फ इसलिए होती है कि मन के कायनाती गीत को शब्द मिल सके।
वो उष्मा थी या ऊर्जा नहीं जानता
बस एक स्पर्श से मैंने ख़्वाहिशों को जलते देखा है
एक आग जो राख नहीं करती
मैंने दिल के पत्थर को कुंदन में बदलते देखा है
वो हँसती है तो सूखी नदी भी
उन्मादित होकर बह उठती है
वो उदास थी........ मैंने समन्दर को सिकुड़ते देखा है
वो छू ले तो पत्थर भी जी उठे
उसकी नजदीकी को मदहोश
और दूरी को तड़पते हुए देखा है
मैं उसे देखूँ या हवाओं को मैंने साँसों को रुकते
और तूफानों को पलटते हुए देखा है
उस एक स्पर्श में न जाने क्या जादू था
मैंने रात भर खुद को छूकर देखा है.............
यही तो वो समय है जब भावनाओं के पास पूरा शब्दकोश होता है, फिर भी वो खुद को परिभाषित करने में विफल हो जाता है। जैसे यौवन का गीत जो पूरी तरह से लौकिक होता है, लेकिन एक अलौकिक अधूरापन लिए, जिसे पूरा करती है खामोशी............

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