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दिल बंजारे खोल डोरियाँ सब खोल दें.....

संवादों के पुल पर


तुम कैसे हो?

मैं अच्छा हूँ?

वो भी अच्छी है ना?

हाँ

फिर?

फिर क्या?

दो अच्छे लोग मिले, प्यार हुआ शादी की, फिर?

वो पहले भी लड़की थी आज भी लड़की है।

तो क्या हुआ प्यार तो अब भी है ना?

मैं नहीं जानता अब कि प्यार किसे कहते है, इसलिए कह नहीं सकता कि प्यार है या नहीं।

लव मैरिज की है फिर भी नहीं जानते प्यार किसे कहते है?

हम साथ बहुत खुश है.....लेकिन.....

लेकिन?

लेकिन मैं आज तक नहीं समझ पाया कि लैला-मजनू, शिरी फरहाद, रोमीयो- जुलियट, मीरा, कबीर ने ऐसा कौन-सा प्यार किया था कि लोग आज भी उनकी मिसाले देते हैं। सिर्फ पति-पत्नी ही नहीं, क्या किसी भी प्यार से हमारा प्यार कम या छोटा है?

नहीं, वो सिर्फ इसलिए उस स्तर को छू सके क्योंकि उनका मिलन नहीं हो सका और उनका प्यार दर्द बनकर लोगों के दिलों में जगह पा गया।

फिर सुदामा कृष्ण से क्या चाहता था? फकीर सड़क पर चीलम पीता हुआ क्यों निकल पड़ता है? उन सब लोगों का थोड़ा-सा अंश मैं खुद में भी अनुभव करता हूँ, हाथ में सिगरेट लिए खाली सड़कों पर निकल पड़ता हूँ, परिवार में कोई समस्या नहीं फिर भी एक सवाल उठता है कि लौटकर घर ही क्यों जाना पड़ता है?

क्योंकि सबके दिलों में एक बंजारा छुपा होता है, किसी में कम किसी में ज्यादा। कुछ लोग उसे सामाजिक दुनिया के साथ जिंदा रख पाते हैं, कुछ लोग उसे मार डालते हैं और कुछ लोग उस बंजारे दिल के पीछे दौड़ पड़ते हैं।

तो प्यार मैंने नहीं उस बंजारे ने किया?

नहीं प्यार तो तुम ही ने किया।

फिर वो बंजारा क्या चाहता है अब मुझसे?

इश्क, ये प्यार नहीं एक जुनून होता है, या दीवानगी कह लो। इसे हम किसी को दे नहीं सकते इसे हम लोगों में फैलाते हैं, ये वही चीज है जो लैला-मजनू, शिरी फरहाद, रोमीयो- जुलियट के बीच था, ये वही है जो कबीर के दोहो में दिखाई देता है, ये वही है जिसने मीरा को जोगन नाम दिया। ये वही है जिसे कोई श्रद्धा कहता है, कोई भक्ति, कोई आवारगी कहता है। और कुछ लोग नाम नहीं दे पाते, तो कहते हैं हम बेनाम ही अच्छे। ये वही है जो तुम्हारे दिल में सवाल बनकर दौड़ता है, जिसका जवाब ढूँढने तुम सड़कों पर निकल पड़ते हो और जब रात तक जवाब नहीं मिलता तो घर लौट जाते हो, इस उम्मीद में कि आज नहीं तो कल उस इश्क को तुम ढूँढ निकालोगे।

कहाँ मिलेगा मुझे ये इश्क?

उसी बंजारे दिल में जो बार-बार अपने जीवित होने का एहसास तुम्हें दिलाता है, जिसका अंश तुम्हें अपने अंदर दिखाई देता है, फिर भी उसे ढूँढने तुम बाहर सड़कों पर निकल पड़ते हो.....

प्रतिक्रियाएँ

Re: दिल बंजारे खोल डोरियाँ सब खोल दें.....
बहुत सुंदर लिखा आपने, बहुत सारे सवाल और उनके जवाब भी एक साथ, वाह।
Re: दिल बंजारे खोल डोरियाँ सब खोल दें.....
आखि़र लौटकर घर ही क्‍यों जाना पड़ता है? हमारे हिंदी में एक कवि हुए मलयज... उन्‍होंने कविता लिक्‍खी थी- 'घर मेरे अस्तित्‍व की रात है, बाहर की टूटन में कितनी सुरक्षा है...' ज़ाहिर है, यहाँ सवाल प्‍यार का नहीं, उस बंजारे दिल का है, जो अन्‍वेषण को अभिशप्‍त है, एक गहरी धुंध में सांसें लेते हुए. प्‍यार की बंजर धरती पर बंजारा बेचारा... आपा, आपने इस दफ़े ख़ासी गहरी कुदाली चलाई है।
Re: दिल बंजारे खोल डोरियाँ सब खोल दें.....
जिन खोजा तिन पाईंया गहरे पानी पैठ.
अस्वीकरण