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मरिचिका




मैं उन्मादित हूँ पर नदी नहीं
गहराई हूँ पर समन्दर नहीं
तपती हूँ पर रेगिस्तान नहीं
मैं रेगिस्तान में भटकते प्यासे की मरिचिका हूँ

मैं शोर हूँ पर शब्द नहीं
इश्क हूँ हौसला नहीं
खामोशी हूँ सुकून नहीं
जिस पर आकर लहरें सूख जाती है मैं वो समेटा हुआ किनारा हूँ

वो कहते हैं मैं ये नहीं
वो कहते हैं मैं वो नहीं
फिर भी वो दोनों हथेलियों को उठाकर माँगते हैं मैं वो दुआ हूँ


प्रतिक्रियाएँ

Re: मरिचिका
मैं भी दोनों हाथ उठाकर दुआ मांगता हूं।
Re: मरिचिका
दुआ माँग रहा हूँ ... आओ एक साथ आमीन कहे... मोक्ष
Re: मरिचिका
marichika
Re: मरिचिका
जब बहने पर आ जाओ तो तुम उन्मादित नदी हों, जिसने तुम्हारे चिंतन को समझा है, उसका अथाह गहरा समुद्र हों, किसी सचमुच के पथिक से सुनो कि कितना तपता रेगिस्तान हो, वो नासमझ हैं जिनके लिए प्यासे की मरीचिका समान हो...... सुनो किसी ध्यानी की पुकार कि सन्नाटे की गूंज हों, या देखो उस प्रेमी को जो हौसला पाता है तुम्हारे ही इश्क़ से, और वो सुकून भरे लम्हे जब सर्वत्र पसरा हों मौन, अनवरत शीश नवाती लहरे जिस तट पर, वो तुम नहीं हों तो फिर है कौन.......... तुम कल थी, तुम आज और कल हों.... जन्मों जन्म मांगी गई अनगिनत दुआओं का फल हों....
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