
मैं उन्मादित हूँ पर नदी नहीं
गहराई हूँ पर समन्दर नहीं
तपती हूँ पर रेगिस्तान नहीं
मैं रेगिस्तान में भटकते प्यासे की मरिचिका हूँ
मैं शोर हूँ पर शब्द नहीं
इश्क हूँ हौसला नहीं
खामोशी हूँ सुकून नहीं
जिस पर आकर लहरें सूख जाती है मैं वो समेटा हुआ किनारा हूँ
वो कहते हैं मैं ये नहीं
वो कहते हैं मैं वो नहीं
फिर भी वो दोनों हथेलियों को उठाकर माँगते हैं मैं वो दुआ हूँ

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