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धरती सागर और सीपियाँ

अमृता प्रीतम के उपन्यास “धरती सागर और सीपियाँ” से




ताकत, जब इंसान अपने भीतर से पाता है, तो उसे इस तरह प्यार करता है जैसे कोई अपनी महबूबा को प्यार करता है। पर जब अपने भीतर से पाने की जगह दुनिया से पाता है, तो उसे इस तरह प्यार करता है जैसे कोई किसी वेश्या को प्यार करता है।

कोई रिश्ता शरीर पर पहने हुए कपड़े की तरह होता है जो कभी भी शरीर से उतारा जा सकता है। पर कोई रिश्ता नसों में चलनेवाले लहू की तरह होता है, जिसके बिना इंसान जीवित नहीं रह सकता।

और कोई रिश्ता शरीर पर पैदा हुई खुजली की तरह होता है.......



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी




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प्रतिक्रियाएँ

Re: धरती सागर और सीपियाँ
:)
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