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अतीत



कल तुमने मुझे उस वक्त छुआ था
जब मैं याद कर रही थी वो दिन
जब स्पर्श भटक जाया करते थे राह से
और मेरी रूह तक लौटने से पहले ही दम तोड़ देते थे

तभी तो तुम्हें वो काँटों की तरह चुभे थे
और मैंने आँखों को मुस्कुराहट से ढँक दिया था
ताकि तुम उस लहू को न देख पाओ
जिसके दाग आज भी मेरे दामन पर लगे हैं.............



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी




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शैफाली एक बेचैनी !
शैफाली एक बेचैनी। शैफाली ब्‍लॉग नही यह एक जिंदगी की किताब है। एक ऐसी किताब जो बहुत खूबसूरत, मासूम और संवेदनशील भी है। जिसने जिंदगी से रंग, शब्‍द, कविताएँ, कहानियाँ और किस्‍से चूराकर अपने-आपको पाला-पोसा और बढ़ा किया है। बढ़ा हो जाने के बाद लेकिन अब ये उतनी मासूम नही रही क्‍योंकि अब ये भीड़ का हिस्‍सा हो गई लेकिन संवेदनशील उतनी ही है। आइऐ इसके कुछ पन्‍नों के बारे में बात करते है। सिर्फ कुछ पन्‍नें। तलाश और इंतजार। तलाश और इंतजार इसके दो पहलु है जिन्‍हें आँखों में बसाए ये किताब साँसे लेती रहती हैं। तलाश उस सच की, नजर की, कल्‍पना की, सपने की जिसे पाकर किताब पुर्णता को प्राप्‍त होगी। इसी तलाश में ये ईश्‍वर की किसी गली में भी भटक आई है। पर अफसोस ' माया मिली न राम ' शैफाली माया और राम के बीच की एक जिंदगी। दुसरा पहलु है इंतजार। इंतजार न जाने किसका। शायद किसी कल्‍पना, किसी सपने का,किसी सत्‍य या असत्‍य का या किसी देह से परे जीवन का। इंतजार न जाने किसका। निश्‍िचत ही इसका अंत बहूत ही पवित्र होगा, देह से परे जीवन की तरह। लेकिन अभी तो यह भटक गई हैं शब्‍दों के महासमर में, कारे कागदों में उलझ गई हैं। शब्‍दों के संघर्ष में इसका जीवन घुल-मिल गया है। शब्‍दों से ही यह स्‍वयं को पालती-पोसती हैं अपने को बड़ा करती हैं और दिन भर जिंदा रखती हैं। शाम होते ही फिर रोज की तरह मर जाती हैं। रात-भर निस्‍तेज,निढाल होकर कल्‍पना, सपने, सोच, असत्‍य, लोग, रिश्‍ते, जीवन, ईश्‍वर, स्‍वयं और यथार्थ सभी को एक साथ एक ही धागे में पिरोकर निंद की आगोश में समा जाती है जेसे सूरज समा जाता है हर शाम उसकी आगोश में। फिर सूबह जन्‍म लेती हैं और इसी चक्र को पूरा करती हैं। चक्र जीवन का। कहते हैं एक जिंदगी को समझने के लिए एक जिंदगी भी कम पढ़ती है क्‍योंकि इसके कई रूप, चेहरे, मुखोटे और भूमिकाएँ होती हैं। एक जिंदगी कई जिंदगियाँ जीती है। आपकी किताब भी कुछ-कुछ इंसानों के जेसी है। यह हँसती है, रोती है, प्रेम करती है, प्रेम करना सिखाती है। यह प्‍यासी है और त्रप्‍त भी। बैचेन भी है और संन्‍तुष्‍ट भी। इसमे सुकून भी है और तड़प भी। इसे तलाश भी है और इंत‍जार भी। यह कल्‍पना भी है और यथार्थ भी। यह जिंदगी को सचमुच जीती हैं। जीना सीख गई हैं। इसलिए परेशान रहती हैं। बेचैन रहती हैं। लेकिन भीड़ में कंही खो गई हैं। जिंदगी के चक्र में आ गई हैं। आपकी यह किताब जिंदगी हो गई हैं जो निरंतर भटकती रही हैं एक आवारा किताब की तर‍ह, जिसके पन्‍नें जिंदगी की हर गली में फड़फड़ा कर इधर-उधर उड़ रहें हैं। इन पन्‍नों को हर कोई पढ़ना और समझना चाहता है और नही भी। शैफाली एक शब्‍द। एक कविता। एक कहानी। एक जीवन और एक बेचैन किताब। शैफाली एक बेचैनी।
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