मेरे ऑफिस में मैं जिस खिड़की के पास बैठती हूँ, शाम को ढलते सूरज की गर्मी से मेरा बाँया हिस्सा उस गर्मी में तप जाता है और दाएँ हिस्से से आती ए सी की ठंडक से दाँया हिस्सा पूरी तरह से ठंडा हो जाता है। तापमान के इस अंतर को एक साथ अनुभव करना बिलकुल उसी तरह है, जैसे अपने अस्तीत्व के दोनों पहलुओं को एक साथ लेकर चलना है। मेरा वजूद भी इसी तरह से दो भागों में बँटा हुआ है, जहाँ एक ओर वो विचार है, जो इतने गहराई में हैं कि कोई मेरे प्रेम और परमात्मा को निकालकर दो अलग-अलग हिस्सों में नहीं रख सकता, तो दूसरी और वो लचीला आचार है, जो सतह पर ऐसे रखा होता है कि जो उसे जिस रूप में देखना चाहे देख सकता है।
इसे ही मैंने दो दुनिया कहा है, एक वो जिसमें लोग मुझे जीते हुए देखते हैं, दूसरी वो जिसमें मैं जीती हूँ लेकिन कोई नहीं देख सकता।
जब अपनी एक दुनिया से दूसरी दुनिया में जाती हूँ, तो लगता है थोड़ी थोड़ी वहीं रह जाती हूँ, किसी एक दुनिया का पलड़ा भारी हो जाता है, तब खुद को टुकड़ों में बाँटकर थोड़ा-सा हलके पलड़े में डाल देती हूँ। जीवन की सतह पर सबकुछ संतुलित और सहज हो जाता है। और जो टुकड़ों में बँट गया उसे कविता या कहानी बनाकर मेरे ब्लॉग में रख देती हूँ।
आप लोग उन्हीं चंद टुकड़ों को पढ़ रहे हैं, जिससे मैंने अपनी दोनों दुनिया को संतुलित बनाकर रखा है। इसमें से किसी एक टुकड़े ने भी यदि किसी और के जीवन को संतुलित किया है, तो मुझे लगेगा मेरी रचनाओं के लिए मैंने जितने शब्द उधार लिए हैं, उनमें से एक अक्षर का कर्ज़ उतर गया...... 

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