बर्फ से ढँकी वादियाँ
मैं और तुम
मैं मैं ही थी
तुम तुम ही थे
लेकिन चेहरा एक ही था ....
मैं बात करूँ तो मेरा चेहरा, तुम बातो करो तो तुम्हारा..................
चले जा रहे थे ऐसे
जैसे इन बर्फीली वादियों से कोई रास्ता जन्नत को खुलेगा.....
अचानक तुमने कहा इससे आगे?
मैंने कहा जो तुम चाहो
तुमने कहा
इस बर्फ को पिघल जाने दो
बस उसके बाद बर्फीला रास्ता नदी हो गया
उस नदी को किस सागर में मिलना है नहीं पता, लेकिन मुझे अपने अंदर सुबह तक कुछ बहता हुआ-सा नज़र आया....वो आँसू नहीं थे, आज तक उस बहती नदी का राज नहीं खुल सका.....
लेकिन उस सपने में एक ही चेहरे पर दो लोगों के आभास का राज़ तब खुला जब तुमने कहा- “कोई मुझे अकेले भी देखता है, तो लगता है उसने मुझे नहीं, मेरे साथ तुम्हें भी देखा है.....”

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