“भावनाएँ मंदिर में जलती अगरबत्ती की तरह होती हैं, जो खुद जलकर दूसरों को खुशबू देती हैं। और ये भावनाएँ हरेक के अंदर होती हैं बस फर्क इतना है कि कोई जलता हुआ दिख जाता है तो कोई अपनी आग अंदर ही छुपा लेता है।“
“कौन जलता है और कौन छुपाता है?”
“जो अपनी भावना व्यक्त कर दें उसकी आग भी दिख जाती है, जो छुपा ले वो अंदर ही अंदर सुलगता रहता है।“
“आज सुबह मंदिर गई थी क्या?”
”नहीं तो, ऐसा क्यों पूछ रहे हो?”
”अगरबत्ती जो जला रखी है अपनी बातों में, कौन है तुम्हारे मंदिर का भगवान?”
”मेरा मंदिर तो खाली है।”
“क्यों भगवान नहीं है?”
”खो गए मुझसे....”
”ढूँढा नहीं होगा तुमने?”
”बहुत ढूँढा...”
“कहाँ?”
“खुद में...”
“तो क्या मिला फिर वहाँ?”
”कोई नहीं, खाली है, बस एक जलती हुई अगरबत्ती, और बाहर तक आती हुई खुशबू।“
“कुछ बातों को आधी रात को देखे सपने की तरह भूल जाना चाहिए, उसे सुबह तक याद रखोगी तो हक़ीकत रूठने लगेगी।“
“यानि खाली मंदिर की तरह नींद को भी खाली रखूँ?”
“ख्वाब तो भूलने के लिए ही होते हैं, कहाँ सच हो पाते हैं?”
“मेरा ख्वाब तो सच हो गया।“
“मतलब?”
”कल रात एक ख़्वाब देखा कि तुम्हारे बालों में उँगलियाँ फेर रही हूँ।“
“फिर?”
“आज सुबह तुम्हारी पीठ पर पड़ा तुम्हारा बाल चुरा लिया।“

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