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जीवन की ऊहापोह में प्रेम,
जैसे भीड़ में माँ के हाथ से
बच्चे की ऊँगली छूट जाती है
सबसे व्यस्त दिन में उदासी,
बेझिझक घर में घुस आती बेखौफ हवाएँ
जो थमने के बाद पैरों में मिट्टी छोड़ जाती है
मन की बैचेनी में यादों का दखल
घर के आँगन के पुराने दरख्त पर
बिना पूछे बेलें चढ़ जाती है
भीड़ में भी तन्हाई से घिर जाना
बाजार से सामान लेकर लौटते हुए
जब आखिरी बस भी निकल जाती है
साथ चलते हुए अजनबी रिश्ते
जब पति पत्नी लड़ रहे हो
और बच्चों की स्कूल बस आ जाती है

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