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उसकी खामोशी में भी एक चीख सुनाई दे रही थी
काजल भी उसकी आँखों से झाँकती परेशानियाँ नहीं छुपा पाया
सबकुछ होने पर भी किसी के जाने का अनजाना खौफ़
न जाने क्या चाहता है उसका छोटा-सा दिल
किसी ने मुझे यह चार पंक्तियाँ लिखकर दी, और कहा जिसे देखकर यह लिखी है, उसके मन के भावों को शब्द दूँ....इन चार पंक्तियों में वो सब था जो उसे अनुभव हो रहा था, जो उसके प्यार को परिभाषित कर सके, लेकिन जिसके लिए लिखा गया था उसके चेहरे की बैचेनी को शब्द देना, मेरे लिए उतना ही मुश्किल था जितना खुद की उस बैचेनी को शब्द देना, जिसका एक सिरा कहीं खो गया हो और दूसरा उलझ गया हो.....
उम्र की दीवारों पर,
यादें दरारों-सी उभर आई,
बारीश के मौसम में
रीसा करती हैं मेरी आँखों की तरह
वो एक नज़र,
जैसे दुनिया आँखों में सिमट आई,
फिर बाँट दिया उसे
आसमां में चाँद, बादल और तारों की तरह
इत्मिनान की मुस्कुराहट में,
परेशानियों का शोर
सबकुछ पा लेने के बाद
खो जाने के डर की तरह
वो एक गुज़ारिश,
मुस्कुराहट को चाँद से तोड़ लाने की
जब फैली हो उदासी
आँखों से निकले काजल की तरह
आज फिर समेट लिया
छत पर सूखने डाले किस्सों को
और सहेज लिया किताब में
बरसों से रखे उस फूल की तरह
पता नहीं उसकी बैचेनी को शब्द दे पाई या नहीं, लेकिन ऐसा लगा मानो मैंने अपनी बैचेनी के उस सिरे को थाम लिया जो कहीं खो गया था, लेकिन उलझन वाले सिरे को और उलझा लिया.........

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