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प्रेम तराजू





चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी




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तुमने एक ही पलड़े में रख दिया
समय को, बातों को, शिकायतों को

और दूसरे पलड़े में डालती रही प्रेम टुकड़ों-टुकड़ों में
और कहती रही
देखो तुम्हारे प्रेम का पलड़ा हलका हो चुका है।

मैं अपनी खामोशियों को लेकर खड़ा रहा
यह सोचकर
कि इसे किस पलड़े में डालूँ
एक और वो बातें हैं
जहाँ मेरी खामोशियों के लिए कोई जगह नहीं
दूसरी ओर वो प्रेम
जिसे मेरी खामोशी कभी परिभाषित न कर सकी.........

प्रतिक्रियाएँ

Re: प्रेम तराजू
आज फिर मुझसे जुड़ा कुछ लिखा है आपने....... ये खामोशी बोलने पे मज़बूर कर देती है...
Re: प्रेम तराजू
अरे वाह ! स्वागत है आपका !
Re: प्रेम तराजू
बहुत ख़ूब. वाह !
अस्वीकरण