तुम्हें दिया था मैंने वो हक
कि तुम कह सको वह बात
जो मुझे शिकायत लगती है और तुम्हें बैचेनी
बजाय इसके कि हम साथ रहकर
देते रहें झूठी मुस्कुराहटें
या सच्ची खामोशी
आँखों में अजनबियत
और हाथों में उदास स्पर्श लिए
लौटने से अच्छा है
तुम कह दो वो बात
जो मुझे शिकायत लगती है और तुम्हें बैचेनी
क्यों नहीं लड़ लेते हम
उस खिलौने के लिए बच्चों की तरह
क्यों हम हमेशा
उम्र से तौल लेते हैं रिश्ते को
यह जानते हुए
कि हमारा रिश्ता
कुछ बरसों का नहीं कई सदियों का है।
आओ उम्र के पलड़े से
कुछ अनुभव कम कर लें
एक बार फिर पहुँच जाए
सोलवें सावन में
जब पहली बार प्यार हुआ था
और लड़ा करते थे
छोटे बच्चों की तरह
देर से आने के लिए...
आओ इक और बार
और लड़ लो जीभर कर
इससे पहले कि
हम सहज हो जाएँ
इन असहजताओं के साथ
जो मुझे शिकायत लगती हैं और तुम्हें बैचेनी......
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प्रतिसाद
Re: शिकायतें
दोस्ती के किस्से हम सुनाएँगे,
सफ़र साथ गुज़ारा आगे भी निभाएँगे,
ना जाने फिर कब मिले ना मिले,
एक दूजे के दिल मे याद बन कर बस जाएँगे
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2008