वो उष्मा थी या ऊर्जा नहीं जानता
बस एक स्पर्श से मैंने
ख़्वाहिशों को जलते देखा है
एक आग जो राख नहीं करती
मैंने दिल के पत्थर को कुंदन में बदलते देखा है
वो हँसती है तो सूखी नदी भी
उन्मादित होकर बह उठती है
वो उदास थी........
मैंने समन्दर को सिकुड़ते देखा है
वो छू ले तो पत्थर भी जी उठे
उसकी नजदीकी को मदहोश
और दूरी को तड़पते हुए देखा है
मैं उसे देखूँ या हवाओं को
मैंने साँसों को रुकते
और तूफानों को पलटते हुए देखा है
उस एक स्पर्श में न जाने क्या जादू था
मैंने रात भर खुद को छूकर देखा है.............
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2008
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