कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनसे हमारा अलग ही लगाव होता है। आप जब कलम उठाते हैं, वे शब्द पहले से ही मुँह बांये खड़े हो जाते है। विषय जो भी हो उन शब्दों को आपने सभी विषयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया होता है। आज मैं आपसे उन्हीं शब्दों को उधार माँगने आई हूँ। यह एक प्रयोग है, जिसे मैं आपके पास भेज रही हूँ। पसंद आ जाए तो अपनी कविता का रिश्ता इससे पक्का समझिए।
दुनिया की सबसे बड़ी कविता बनाने का यह एक अभियान है, जिसे मैं अपने कुछ शब्दों से प्रारंभ कर रही हूँ। इस कविता की निरंतता में अपनी कविता की पंक्तियाँ अपने नाम के साथ टिप्प्णी में भेजें जिसे बाद में इस कविता में आपके नाम के साथ जोड़ दी जाएगी।
हो सकता है कुछ लोगों को यह कविता ना लगे, लेकिन मेरे लिए हर वो पंक्ति एक कविता है जो दिल के कोने में छिपी किसी भी भावना को शब्दों में ढाल दें, क्योंकि भावनाओं को जब शब्द मिल जाते हैं, तो वो मुकल्लल हो जाती हैं।
घर की दहलीज को पार कर
आँगन में धूप सेंकते-से,
कभी मोहल्ले के शोर में
पड़ोसी के साथ फुसफुसाते हुए
कभी समाज की संकुचित विचारधारा,
कभी मॉडर्न सॉसाइटी को कोंसते-से
कभी मन की उलझनों में फँसे
तो कभी परमात्मा को खोजते-से
कभी जीवन में मदहोश
कभी मृत्यु पर रोते-से
कभी खुद पर इठलाते हुए
कभी ईर्ष्या में जलते हुए
कभी प्रेम में बहते हुए
कभी भक्ति में रमे हुए
मुझे मेरे विचार दिखाई देते हैं
यूँ ही हर जगह भीड़ बनाकर घूमते-से
जब भी बढ़ती हूँ उस भीड़ को चीरते हुए
मिल जाता है एक एकांत
कहीं कोने में दुबका
मेरा इंतज़ार करता हुआ........................शैफाली शर्मा
इंतज़ार में उम्र गुज़र गई
अब जाकर मिली ज़िंदगी
हर पल को सदियों की तरह जीने लगे हैं
जैसे बच्चें परियों की कहानियों में जीते हैं..........गर्विता
जिंदगी बड़े अजब मोड़ दिखाती है,
कभी हँसाती तो कभी रुलाती है...
इन्हीं मोड़ों पर भटकते हुए,
एकाएक रास्ता दिखा जाती है
जिंदगी जो दिखाए वही रास्ता गर चुने,
भटकन खुद ब खुद खत्म हो जाती है...........श्रुति
रिश्ते भी फ़सलों की तरह होते हैं,
स्नेह की बारिश न हो तो सूख जाते हैं
नहीं दोगे अगर इन्हे समय,
गर नही करोगे देखभाल.............दीपक कुमार गुप्ता
खुशी कहाँ कहाँ नही तलाशा मैने तुझको
उस पर तुर्रा ये कि नहीं जानता खुशी है क्या
और कैसी खुशी चाहिये पर खुशी को तलाश रहा हूँ मैं...... .............दीपक कुमार गुप्ता
खुशियों को जीवन में तलाशकर
नहीं पाया जा सकता वो तो एक रंग है
जिसे हमें अपने कैनवास पर उतारना है चित्रों की लकीरें चाहे आड़ी तिरछी हो कोई ग़म नहीं
खुशियों के रंगों से उन्हें सदैव सजाना है.............महक
फिर इन पत्थरों के जंगलों में निकले हो ढूँढने खुशियाँ,
यहाँ पत्थर के दिल है जो कभी पिघला नहीं करते.......अज्ञात
खुशियाँ ढूँढने से नहीं,
खुशियाँ तो जिंदगी जीने से मिलती हैं,
जीते चलो जिंदगी को, नए रंगों के साथ,
अपने सपनों में रंग भरते चलो,
तो जिंदगी सिर्फ तुम्हारी हैं, सिर्फ तुम्हारी.................प्रिय़ंका शाह
डूब कर देखो प्यास और भी बढ़ जायगी
ये खुशी नहीं कि चार पल मे गुज़र जायेगी
दर्द की घड़ियाँ बड़ी सुस्त कदम चलती हैं आज़माओ
…ज़िन्दगी और सँवर जायेगी............................पारूल
विचारों की भीड़ में सब कुछ बिखर सा गया
दुनिया ने जो सोचा वो उसका ख्याल था
मेरा ख्याल तो बस तलाश की बाँहों में था मैं खोजता हूँ अब भी उस भीड़ को
मिल जाए मुझे बिखरा हुआ ही कुछ ....................गुमनाम
मिली है जिन्दगी चार दिन के लिए
कहीं गिले शिकवों शिकायतों में ही न गुजर जाए
मिटाकर मन मुटाव आओ करो सुलह,
लगो गले से
कहीं बिरहा का खंजर न
छाती से पार उतर जाए
दुनिया के इस मेले में,
कहीं छूट न जाए हाथों से हाथ
सदा के लिए एक दूसरे से दूर न हो जाए
एक दिन आएगा पैगाम
और बिन टिकट चले जाएंगे
फिर शायद ही तेरी इस नगरी में लौट कर आए
जी लो हँसकर इस पल को,
ना जाने कृष्ण अगले पल हम कहां जाए.................. हरकृष्ण शर्मा
जिंदगी! मैं नहीं जानता कि तू है क्या चीज,
किंतु इतना जानता हूँ कि एक दिन हमें
जुदा अवश्य होना पड़ेगा!
और हम कब, कैसे व कहाँ मिले
यह अभी तक मेरे लिए रहस्य बना हुआ है
ओ जिंदगी हम अच्छे और बुरे दिनों के लंबे
समय से साथी रहे हैं और ऐसे में हमारी दोस्ती
बहुत प्रगाढ़ हो गई है, इसलिए हमारी जुदाई बहुत
त्रासदायक होगी।
इसे शब्दों में बखान करना असंभव है।
उसे केवल एक नि:श्वास व एक आँसू से ही व्यक्त
किया जा सकता है।
इसलिए मेरी प्रार्थना है कि
चुपके-चुपके चले जाना,
बहुत कम समय पूर्व सूचना देना
अपना समय खुद ही तय करना
मुझे अलविदा न कहना
बल्कि किसी खुशनुमा मौसम में कहीं सुप्रभात कहना।......................विशाल मिश्रा

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