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वो दिनभर ढूँढती रही ठिकाना




चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


वो दिनभर ढूँढती रही ठिकाना
मेरी बातों की सरज़मीं पर
और मैं उसे खामोशी की बाँहों में लिए
भटकता रहा
कि कुछ हर्फ किसी राह से मिल जाए
और मैं बता सकूँ कि
मेरा इश्क वो नहीं
जो तुम्हारी बाँहों से फिसलकर
लबों पर अटका रहे
उसे मैंने जलते अँगारों पर रखा है
जिसमें कुव्वत हो वो आकर ले जाएँ..............

प्रतिसाद

Re: वो दिनभर ढूँढती रही ठिकाना
great!!
अस्वीकरण