

उस रोज़ शाम होते होते
बैचेनी ने अजीब रूप अख़्तियार कर लिया था
उँगलियाँ की-बॉर्ड पर चल रही थीं
बातें मन की सतह पर
मॉनीटर पर अक्षरों के बदले
दिखाई देने लगी थीं उलझने
बार-बार डिलिट करने पर भी
यादें उन्हीं बातों पर आकर बैठ रही थीं
जिन्हें मन की गहराई में जाने की
इजाजत नहीं दे पा रही थीं
कई बार सोचा स्क्रीन शॉट लेकर
सहेजकर रख लूँ उन दिनों के लिए
जब तुम लौटकर आओगे और पूछोगे
कि जब मैं नहीं था
तब कौन-से शब्द थे तुम्हारे पास
जो किसी कविता में नहीं ढल पाए
या नहीं लिख सकी तुम कोई अधूरी-सी कहानी
तब बताउँगी तुम्हें कि
उस रोज़ शाम होते होते
बैचेनी ने अजीब रूप अख़्तियार कर लिया था
कम्प्यूटर शट डाउन करते समय सोचा था
बैचेनी भी चली जाएगी
सुबह आकर कम्प्यूटर ऑन किया
तो उसी बैचेनी को मॉनीटर पर अलसाते हुए देखा......

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