श्रेणियाँ: दो दुनिया
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12 मार्च, 2008
उस रोज़ शाम होते होते बैचेनी ने अजीब रूप अख़्तियार कर लिया था उँगलियाँ की-बॉर्ड पर चल रही थीं बातें मन की सतह पर मॉनीटर पर अक्षरों के बदले दिखाई देने लगी थीं उलझने बार-बार डिलिट करने पर भी यादें उन्हीं बातों पर आकर बैठ रही थींजिन्हें मन की गहराई में जाने की ... और पढ़ें...