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12 मार्च, 2008

 

• वो दिनभर ढूँढती रही ठिकाना

वो दिनभर ढूँढती रही ठिकाना मेरी बातों की सरज़मीं परऔर मैं उसे खामोशी की बाँहों में लिए भटकता रहा कि कुछ हर्फ किसी राह से मिल जाए और मैं बता सकूँ कि मेरा इश्क वो नहीं जो तुम्हारी बाँहों से फिसलकर लबों पर अटका रहे उसे मैंने जलते अँगारों पर रखा है जिसमें ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• शाम होते होते

उस रोज़ शाम होते होते बैचेनी ने अजीब रूप अख़्तियार कर लिया था उँगलियाँ की-बॉर्ड पर चल रही थीं बातें मन की सतह पर मॉनीटर पर अक्षरों के बदले दिखाई देने लगी थीं उलझने बार-बार डिलिट करने पर भी यादें उन्हीं बातों पर आकर बैठ रही थींजिन्हें मन की गहराई में जाने की ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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