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इबादत




चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी























कुछ संकेत खुदा की तरफ से थे
कुछ रूह को छूती हुई आवाज़ें थी
कुछ खलाओं से टकराकर लौट आई पुकारें
कुछ मन को भेदती हुई तलब

ऐसे ही पलों में तुझे देखा
इश्क में सराबोर

मैं उलझा हुआ हूँ
मन के भीतर से निकलते दोराहे में,
जो एक तुझ तक जाता है
दूजा उस खुदा तक.....
जानते हुए कि
दोनों की मंज़िल एक ही है
गर इबादत में कमी न आई।

अस्वीकरण