Nitin Bhurbhure द्वारा 7 मार्च, 2008 9:54:02 AM IST पर टिप्पणी
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अपना बदन भी उतार देने का मतलब तो ये होगा की मेरे पास
मेरा कुछ भी नहीं बचेगा| समाधि के देश में प्रवेश से पहले वहाँ के रिवाज तो स्वीकारने होंगे| फिर चाहे वो प्रेम समाधि हो या ध्यान समाधि| माँ अमृता प्रीतम के चरणों में मेरा शत शत प्रणाम|
krishnakant द्वारा 14 मई, 2008 12:36:11 PM IST पर टिप्पणी
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आप अमृताजी की कुछ अच्छी चीजें पढ़वाती रहती हैं। यह कविता भी उनमें से एक है। कई बार मुझे लगता है कवि क्या कह रहा है वह उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना यह कि कवि ने उसे कैसे कहा है। अमृताजी की भी यही खासियत है कि उनके कहन का ढंग अनूठा है और यह कविता उसकी एक छोटी सी मिसाल है। आप देखिए कि एक गूढ़ बात को उन्होंने कितनी आसानी से औऱ बिना किसी बड़ी धीर-गंभीर मुद्रा के कह दिया है। बड़ा कवि वही होता है जो गूढ़ बातों को अनूठे ढंग से कहता है। गालिब को याद करिए जिन्होंने कभी कहा था कि यूं तो और भी सुखनवर हैं दुनिया में लेकिन कहते हैं कि गालिब है अंदाजे बयां और।
shatayu द्वारा 14 मई, 2008 9:38:23 PM IST पर टिप्पणी
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तू अपना बदन भी उतार दे- यह लाइन कविता की जान है- इस कविता का थोड़ा और विस्तार होना था लेकिन अमृता थोड़े शब्दों का ही इस्तेमाल करती है। मैंने उन्हें बहुत पढ़ा लेकिन...?
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