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प्रेम, प्रतीक्षा, प्रणय और परमात्मा



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


“मेरे दोस्तों से तुम्हें कोई शिकायत नहीं?”

”अब नहीं”

”पहले तो हुआ करती थी”

”हाँ जब तुम सिर्फ दोस्त थी”

“और अब?”

“कुछ भी नहीं”

”मतलब, तुम्हें मुझसे प्यार नहीं”

”हुआ करता था, अब नहीं”

”और जो शादी का वादा?”

”वो हम करेंगे”

”जब तुम्हें प्यार नहीं तो शादी क्यों करोगे”

”क्योंकि अब मैं किसी और से प्यार नहीं कर सकता”

”मैं नहीं समझ पा रही हूँ”


“कोई दोस्त कोई आकर्षण कहीं नहीं जाते, सब हमारे आसपास मंडराते रहते हैं, बस ऐसा कुछ घटित होता है कि हम हमारे आसपास का कुछ नहीं देख पाते, सब नज़रों से ओझल हो जाता है। क्योंकि मन किसी एक पर केन्द्रित हो जाता है बिलकुल वैसे ही जैसे ध्यान के लिए किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित होने को कहा जाता है। और जब उस एक केन्द्र पर ध्यान अटक जाए तो फिर उस केन्द्र को भी राह से हटाना होता है, ताकि आत्मा और परमात्मा के बीच जो बाधा बना हुआ बैठा था, जिसे हम प्रेम कहते है मन के भीतरी दिवालों से वो भी ओझल हो जाए और जब आँखें खुले तो पता चले कि प्रेम मंजिल नहीं परमात्मा तक पहुँचने का वाहन है।“

“तुम्हारी बड़ी-बड़ी बातें नहीं सुनना मुझे, ये उपदेश किसी और को देना, मुझे यह बताओ जब प्यार नहीं रहा तो शादी क्यों?

”तुम्हें वो दिन याद है जब तुमने मुझसे कहा मुझसे शादी कर लो?”

“हाँ, तो?”

“कहने को यह समाज का एक नियम है लेकिन क्या तुम इसका अर्थ जानती हो?”

”तुम बताओ”

”बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो विवाह के अर्थ को समझ पाते हैं, विवाह का अर्थ सिर्फ एक व्यक्ति का दूसरे के साथ आत्मिक या दैहिक मिलन नहीं होता, यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जब व्यक्ति प्रेम की चरम सीमा को छू रहा होता है और उस चरम सीमा को पारकर एक नई दुनिया में कदम रखता है जहाँ उसे सिर्फ अपना ही नहीं अपने साथी का भी जीवन जीना होता है ताकि वह जीवन की निरंतता की पवित्र प्रक्रिया को आत्मा से स्वीकार कर सकें, सिर्फ समाज के एक नियम की तरह नहीं....। अच्छा बताओ तुम्हारे कितने दोस्त है?”

”बहुत सारे”

”कभी किसी से शादी का प्रस्ताव रखा?”

“नहीं”


”मुझे दो साल पहले पूछा था तुमने, सही है?"

"हाँ"

" उसके बाद कई दोस्त बने?"

" हाँ"

" किसी से आकर्षण भी रहा होगा?"

“हाँ”

“फिर भी इतने साल सिर्फ मेरी प्रतीक्षा क्यों की”

”क्योंकि मुझे प्यार है तुमसे”

”और मैं कहूँ मुझे नहीं है, तो?”

“मुझे तब भी रहेगा, हाँ हो सकता है हमारी शादी न हो”

”किसी और से कर लोगी?”

”शायद.....”

”मैं नहीं कर सकूँगा”

”क्यों?”

”क्या तुमने कभी सुना है कि किसी भगवान ने अपने वाहन को बदल दिया था”


“क्या मैं वाहन हूँ”

”नहीं हमारा प्यार”

“और परमात्मा कौन है”

”तुम”

”तुम मुझे भगवान बना रहे हो?”

”क्यों पति परमेश्वर हो सकता है तो पत्नी क्यों नहीं?”


“क्योंकि औरत जब प्यार करती है, तो अपना सबकुछ समर्पित करती है, मन भी, देह भी, अपना सर्वस्व”

”आज मैं अपना सबकुछ समर्पित करता हूँ, क्या तुम अपने प्रेम को वाहन बनाने की अनुमति दे सकती हो ताकि मैं अपने परमात्मा को पा सकूँ?”



प्रतिक्रियाएँ

Re: प्रेम, प्रतीक्षा, प्रणय और परमात्मा
आपकी इस भावना को मेरा सत्-सत प्रणाम . प्रेम तो प्रभु को पाने का मार्ग है आपने बहुत अच्छा लिखा है मेरे पास शब्द नही है आपकी प्रसंशा के लिये /
Re: प्रेम, प्रतीक्षा, प्रणय और परमात्मा
बहुत प्यारा संवाद है| प्यार का अर्थ प्रकट है इस संवाद में| प्रेम भरी निगाहें आखिर अपने प्रेमी में परमात्मा ढूँढ ही लेती है|
Re: प्रेम, प्रतीक्षा, प्रणय और परमात्मा
मैं आपकी अधूरी बातों को पूरा नहीं करती हूँ 'माँ' मैं तो बस आपके दिल की बातों को शब्‍दों से कह देने का ज़रीया हूँ।
अस्वीकरण