Webdunia: Portal - Search - Mail - Greetings   More >>
Support | Font Download | Feedback
Search  
Welcome, Guest  [ Register | Sign In ]

सिर्फ एक औरत





चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


तुम सच की धरातल पर खड़े
किसी महात्मा की मूरत की तरह
जिसको लोग नमस्कार कर आगे बढ जाते हैं
एक और झूठ बोलने के लिए,
मैं कल्पना के आसमान में उड़ती अदनी-सी चिड़िया।

तुम सच के विकृत रूप को
नीडरता से स्वीकार करने वाले
रोशनी से भरपूर दिन
मैं सपने के सच हो जाने के डर से
नींद से जाग जाने वाली अंधियारी रात।

तुम किसी बच्चे की तरह
निर्मल, निश्छल
और मैं उम्र के जंगलों में भटकता जीवन.......
तुम एक बार में सिर्फ एक औरत को
प्यार करने वाले आदमी



और मैं आदमी को कभी माँग में, कभी दिल में
तो कभी कोख में रखने वाली एक औरत
सिर्फ एक औरत..............

प्रतिक्रियाएँ

Re: सिर्फ एक औरत
नारी की महानता को शब्दो मे नही बांधा जा सकता है , ........................ आपने अच्छा लिखा है ,
Re: सिर्फ एक औरत
बहुत बढ़िया है आपकी कल्पना में ढली कविता।
अस्वीकरण