
उसकी बातों ने दिल में सवालों का जंगल खड़ा कर दिया था, रातभर उस जंगल में जवाबों के लिए रास्ता तलाशती रही। उसे कभी देखा नहीं लेकिन फिर भी उसकी मासूमियत मेरे ज़हन में चेहरा ढूँढती रही। जब तक उससे नेट पर बात करती रही उसे मैं एक बड़ी उम्र की महिला समझती रही, जो जीवन की समस्याओं को ओढ़कर बैठी हो और अपने दायरे से बाहर की दुनिया नहीं देखी.............मैं उसे उसके दायरे से खींचती रही, वो खुद में सिमटती रही............इस रस्साकशी में कभी वो मेरे पाले में थी, कभी मैं उसके पाले में, और जब अंत में उसने अपनी उम्र बताई, तो जैसे मेरे हाथ से रस्सी छूट गई, मैं नहीं जानती वो गिर पड़ी या संभल गई....लेकिन उसकी बातें रात भर उसकी मासूमियत का चेहरा ढूँढती रही................
“आपका लेख पढ़ा, लगा मानो आपने मेरी ही भावनाओं को शब्दों में ढालकर मेरे सामने रख दिया”
”दिल से लिखी बातें हैं, किसी न किसी दिल से ज़रूर टकराएगी”
”मैं भी पहले लिखती थी, आपका लेख पढ़कर लगा जो मैं लिखना चाहती हूँ, वो तो आपने पहले ही लिख दिया है”
“बातें एक जैसी होती है, कहने का अंदाज अलग-अलग। हम इनसान किसी न किसी को ढूँढते रहते है, जो हमें उतनी ही गहराई से सुनें, जितनी गहराई से हम महसूस करते हैं, लेकिन हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं होता, इसलिए लिखकर दिल हलका कर लेते हैं”
“हाँ मैं भी यही सोचती हूँ कि लेखन सबसे अच्छा तरीका है खुद को अभिव्यक्त करने का, लेकिन एक डर रोक लेता है.........................”
”हाँ वो डर जानती हूँ, जीवन को खुली किताब बना लेने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए। लेकिन, मन साफ हो तो कोई डर हावी नहीं होता। फिर कब तक डरते रहेंगे? ये डर आपको जीने नहीं देता.....”
“जी तो वैसे भी नहीं रही.....शायद आप ठीक कह रही हैं, कुछ खो जाने के डर से नहीं लिख रही थी, लेकिन जिसे पाया ही नहीं उसे खोना कैसा?”
“बिलकुल सही, लेकिन जो कुछ भी नहीं पाया मैं उसे मैं लिखकर पा लेती हूँ। सच जो सुकून मिलता है वो और कहीं नहीं। फिर आपकी तरह कोई यह कह दे कि यह तो मेरे ही दिल की बात है तो लगता है लिखना सफल हुआ।“
“क्या यह हर लड़की की कहानी है? या सिर्फ हमारी तुम्हारी?”
“हर उस दिल की जो प्यार करना जानता है, प्यार को पाना चाहता है और यह भी जानता है कि प्यार पाने का नहीं सिर्फ मेहसूस करने का नाम है, वो तुम्हारे ही अन्दर की चेतना है जिसे हम दूसरों में तलाशते हैं।“
”हाँ सदियों से सुनते आ रहे हैं, प्यार लेने का नहीं, देने का नाम है.....लेकिन कौन इस बात को मानता है, प्यार पाने की इच्छा तो हर एक में होती है...और उसी प्यार की उम्मीद हमें मार रही है.....बिखेर रही है...। आप बुरा न माने तो एक बात पूछ सकती हूँ?”
“बिलकुल”
”आपकी लव मैरिज है या अरैंज”
”क्या फर्क पड़ता है इससे?”
”पड़ता है।“
”तुम्हारी शादी हो चुकी है?”
”हाँ”
”लव मैरिज तो नहीं होगी, क्या मैं सही हूँ?”
”नहीं आप गलत हो, लव मैरिज है।“
”फिर भी यह भटकन??? इसका मतलब यही है कि प्यार और शादी का कोई रिश्ता नहीं.... इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।“
”पड़ता है, प्यार सपना है, शादी हक़ीकत....“
”हाँ और हम सपने को हकीकत में देखना चाहते हैं..... सपने को सपना रहने दो, अपने सपने से प्यार करो, वैसे ही जैसे शादी से पहले करते थे, अपने प्यार को फिर वैसे ही मेहसूस करो, उस व्यक्ति को हकीकत में रहने दो, उसने जो प्यार दिया था उसमें जीयो....जानती हूँ बहुत मुश्किल होता है दो दुनिया को जीना.....सपना और हकीकत। मैं दोनों एक साथ जीती हूँ, फिर एक दिन ऐसा आया मेरे प्यार, मेरे सपने का इतना विस्तार हुआ कि हकीकत भी उसमें समा गया....मेरा प्यार जीत गया।“
“आप खुशकिस्मत हो...... पर मेरे लिए नामुमकिन है...शायद कुछ भी न बचे, न सपना न हकीकत....”
“अरे वाह, यह तो और अच्छा है, तीसरी दुनिया, जिसमें कुछ नहीं न सपना न हकीकत, सिर्फ तुम...सिर्फ तुम और तुम्हारा अस्तित्व, जो किसी भी बात पर निर्भर नहीं, जिसने अपनी एक अलग दुनिया बना ली सबसे अलग जहाँ किसी को आने की इजाजत नहीं....”
“ऐसी दुनिया पहले भी बना चुकी थी, फिर अचानक कोई आया.....और सब बदल गया....चाहती तो हूँ फिर से वही दुनिया बनाना लेकिन फिर कदम रुक जाते है......ऐसा लगता है.....इंतज़ार कर लो ....शायद सपना हकीकत बन जाए.....फिर ये भी लगता है हकीकत और बुरी न हो जाए....।“
“कोई आया मतलब ही दुनिया वैसी नहीं थी......मैंने कहा ना ऐसी दुनिया जहाँ किसी को आने की इजाजत नहीं.....और जो है उनको अपने करीब रखकर इस दुनिया में जीना होता है....इसे इतना आसान मत समझो, जो दिल प्यार करता है वो किसी को तकलीफ नहीं देता।“
“लेकिन हमें जो तकलीफ मिलती है? तो क्या हमसे प्यार नहीं है.......”
”है लेकिन हमारा दिल इतना बड़ा है कि छोटी-छोटी बातों को भी दिल से लगा लेते हैं, अपनी प्राथमिकता तय करो क्या करना है? सिर्फ प्यार करना है, सिर्फ दूसरों के दिए दर्द गिनना है, या अपनी तीसरी दुनिया में जीना है? जिस दिन तय कर लोगी उस दिन न तुम्हें तकलीफ होगी, न तुम किसी को तकलीफ दोगी।“
“फिलहाल तो आप ही के शब्दों में कहूँ तो अपने दुख को रोज नया लिबास पहनाती हूँ।“
“जैसे जीयो खुश होकर जीयो....खुद को पा लो कैसे भी....दूसरों को पाने की कोशिश करोगी तो यह सब तो लगा रहेगा....एक बात पूछूँ, तुम्हें कोई बच्चा है?“
“नहीं”
“शादी को कितने साल हुए?”
“साल नहीं....सिर्फ दो महिने...............”
इसके बाद मैंने उससे कुछ नहीं कहा, लगा हमारे बीच जितनी भी बातें हुई वो सारी मेरे हाथों से छूट गई......इतनी कम उम्र में जीवन के प्रति इतनी उदसीनता वो भी लव मैरिज के दो महिने बाद....क्या कोई कारण खुद के अस्तीत्व से बड़ा हो सकता है? क्या प्यार से बढ़कर कुछ नहीं होता? जब प्यार इतना बड़ा और अलौकिक है, तो फिर कुछ सामाजिक रस्मों की चक्की में कैसे पीस सकता है? क्या आज भी हम प्यार के सही मायने नहीं जानते?

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