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मीठा समन्दर

नींद से निकले शब्द




चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी





सुबह की नींद में सराबोर आँखों में
रात का कोई ख़्वाब अटक-सा गया था

लफ्ज़ अँगड़ाईयाँ लेते रहे
और कुछ पंक्तियाँ लबों पर थीं......

कि तेरे स्पर्श ने क्या जादू किया
तू समन्दर से निकली
और समन्दर मीठा हो गया......

कागज़ पर उतारा उन लफ्ज़ों को
तो गज़ल बन गई
क्या जादू था तेरी बातों में
कि खामोशी भी उसमें उलझ गई

मैं कहता रहा तेरी सूरत याद है मुझे
रंगो को छुआ तो लकीरें हाथों से फिसल गई

मैं ढूँढता रहा रंगों को
रात के ख़्वाबों में
लेकिन वो भी अटक गया था
सुबह की नींद में सराबोर आँखों में

बस लबों पर कुछ लफ्ज़ अँगड़ाइयाँ ले रहे थे

कि तेरे स्पर्श ने क्या जादू किया
तू समन्दर से निकली
और समन्दर मीठा हो गया......


अस्वीकरण