वह मुझसे अकसर पूछता था उसका एटिट्यूड कैसा है? बावजूद इसके कि उसकी अजनबियों वाली हरकतें मुझे पसंद नहीं थी। लोगों के सामने यूँ मिलता जैसे मुझसे कोई लेना देना ही नहीं। मुझसे प्यार ना करने की कोशिश में वह ठीक से दोस्ती भी नहीं निभा सका। और मैं सिर्फ प्यार करने की कोशिश में उससे दोस्ती नहीं कर सकी। दोनों अपनी-अपनी जिद पर अड़े थे। वो सिर्फ दोस्ती चाहता था, वो भी ऐसी जिसका किसीको पता ना चले। मैं सिर्फ साथ चाहती थी पल भर का, दस मिनिट का या एक घंटे का। उस एक घंटे में अपनी पूरी दुनिया जी लेना चाहती थी। उसे लगता था यह एक घंटा एक घंटे में खत्म नहीं होगा वह एक शुरुआत हो जाएगी रोज उस एक घंटे की तलब की।
पहले उस एक घंटे के समय को विषय बनाकर वाद-विवाद चलता था, मैं मज़ाक में कई बार अपने दिल का सच बता देती थी और वह झूठ भी इतनी गंभीरता से बोल देता था कि मेरे पास उसकी बातों पर विश्वास कर लेने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था। क्योंकि उसके झूठ का स्वरूप हक़ीकत की धरातल पर जड़े जमाए हुए था। और मेरा सच कल्पनाओं के आसमान में स्वच्छंद उड़ता रहता। उसे गर्व था जमीन से जुड़े रहने का, मैं खुश थी सपनों के रंगीन पर लगाकर। उसका गर्व मुझे हमेशा गुस्सा दिलाता था। लेकिन उसने कभी नहीं कहा कि मुझसे प्यार ना करो। कहता भी कैसे वह जानता था अपने सपनों के रंग मैंने उसकी आँखों से ही चुराए थे। वह कैसे कहता कि मैं यूँ ही उसकी आँखों से रंग चुराकर कल्पनाओं के आसमान में उड़ती रहूँ ताकि वह अपने सपनों को कनखियों से झाँककर देखता रहे। वह कह नहीं सका और मेरा गुस्सा बढ़ता गया।
समय अपनी गति नहीं छोड़ रहा था और हमने अपनी बातों की गति को बहुत धीमा कर लिया था। हमारे बीच की खामोशी का अंतर बढ़ता जा रहा था। मैंने अपनी आँखों में उसकी अजनबियत को ओढ़ लिया था। उसके एटिट्यूड को मैंने अपना लिया। तब जाना कितना आसान होता है सपनों के रंगीन पर लगाकर, कल्पनाओं के आसमान में उड़ना और कितना मुश्किल होता है सच को छिपाकर झूठी अजनबियत को ओढ़कर रखना।
उसका काम ज्यादा मुश्किल था। मेरा काम बिलकुल आसान, जो मन में आता कह देती थी, जो जी में आता कर लेती थी। मैं उस पर अकसर गुस्सा करती रहती कि अपनी भावनाओं को जाहिर करने की हिम्मत नहीं उसमें और वह अकसर कहता अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने के लिए ज्यादा हिम्मत चाहिए।
एक दिन फिर पूछा उसने मेरा एटिट्यूड कैसा है? मैं कुछ ना कह सकी, कहती भी कैसे कि इस बार मैंने उसकी आँखों से रंग नहीं उसकी अजनबियत को चुरा लिया है। मेरे सपनों को मैंने अजनबी कर लिया और वह अपनी आँखों में बचे रंग छिपाकर लौट गया.......

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