
मेरी ज़िंदगी का वो हिस्सा
जिसे तलाशती रही मैं बरसों................
जब मिला तो यूँ
जैसे खोई हुई कायनात
मनुष्य की कल्पना से परे,
जैसे चाँद पर पहला कदम,
जैसे मंगल गृह पर जीवन का अंदेशा,
जैसे विचित्र किंतु सत्य पर डगमगाता विश्वास,
जैसे अपनी ही आत्मा में परमात्मा की खोज,
जैसे तुम और मैं
और जीवन का वो हिस्सा
जिसे तलाशती रही बरसों...................

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