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तुम और मैं



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



मेरी ज़िंदगी का वो हिस्सा
जिसे तलाशती रही मैं बरसों................

जब मिला तो यूँ
जैसे खोई हुई कायनात
मनुष्य की कल्पना से परे,
जैसे चाँद पर पहला कदम,
जैसे मंगल गृह पर जीवन का अंदेशा,
जैसे विचित्र किंतु सत्य पर डगमगाता विश्वास,
जैसे अपनी ही आत्मा में परमात्मा की खोज,

जैसे तुम और मैं
और जीवन का वो हिस्सा
जिसे तलाशती रही बरसों...................

प्रतिक्रियाएँ

Re: तुम और मैं
सुंदर, एकदम अलग सी कविता ।
Re: तुम और मैं
शेफाली जी, सब्से पेह्ली बात तो ये कि कअमाल का है अप्का ब्लोग मैं सच्मुच ही बेहद प्र्भावित हुआ. आपकी कविता भी बहुत ही सुंदर लगी. आगे से अप्ने प्रशंश्कोन मऐन मुझे भी जोर लें.
Re: तुम और मैं
जिंदगी एक तलाश है| बहुत कम लोगो को वो मिल पाता है जिसकी उन्हें तलाश होती है| ऐसे क्षण अनंद स्वाभाविक है| ऐसे क्षण इतनी सुंदर कविता लिखी जाये स्वाभाविक है|
Re: तुम और मैं
aapki kavita mujhe behad achhi lagi esi soch or vichar bahut kam hi melte hen.
Re: तुम और मैं
बहुत सुंदर लिखा है ... आप ने......
Re: तुम और मैं
अति सुंदरम..........
Re: तुम और मैं
काफी भावपूर्ण है ये! पढ कर अच्छा लगा! काफी दर्द है. http://harendra.mywebdunia.com/2008/06/12/1213259340000.html
अस्वीकरण