
हँस लेता हूँ खुद पर
जब कभी आज़ाद होने का खयाल आता है
मैं घर छोड़ कर कई बार निकल जाता हूँ
क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ ज़िम्मेदारियों से
मैं शहर छोड़कर चला जाता हूँ अकसर
क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ रोजी रोटी के झँझटों से
मैं देश छोड़ कर चला जाता हूँ कभी कभी
क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ आज़ाद भारत के कैद से
लेकिन मैं आज़ाद नहीं हो पाता
अपने कुंठित विचारों से,
घुटती पुकारों से
आज़ाद नहीं हो पाता हूँ
अपने ही खींचे दायरों से,
अपने सपनों से खयालातों से
इच्छाओं से
मोहब्बत से
और.....खुद से

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