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मैं आज़ाद हूँ?




चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


हँस लेता हूँ खुद पर
जब कभी आज़ाद होने का खयाल आता है

मैं घर छोड़ कर कई बार निकल जाता हूँ
क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ ज़िम्मेदारियों से

मैं शहर छोड़कर चला जाता हूँ अकसर
क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ रोजी रोटी के झँझटों से

मैं देश छोड़ कर चला जाता हूँ कभी कभी
क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ आज़ाद भारत के कैद से

लेकिन मैं आज़ाद नहीं हो पाता
अपने कुंठित विचारों से,
घुटती पुकारों से
आज़ाद नहीं हो पाता हूँ
अपने ही खींचे दायरों से,
अपने सपनों से खयालातों से
इच्छाओं से
मोहब्बत से
और.....खुद से

प्रतिक्रियाएँ

Re: मैं आज़ाद हूँ?
मुझे ऐसा लगता है कि इस कविता में विचार हैं लेकिन कविता का कलेवर नहीं है। छंद मुक्त कविता गद्य से अलग होती है। इसके काव्यमय स्वरूप को प्राप्त करने के लिए एक तरह की लय और व्यंजना को पकड़ना होता है। बिना पकड़ के लिखी गयी कविता नारा हो सकती है, वाक्यांश हो सकती है, ल्किन कविता नहीं। दूसरी बात कविता में शब्दों का चुनाव अयन्त सावधानी मांगता है। मुझे कविता में आजाद शब्द के चयन में भी गड़बड़ी लग रही है। कविता की कथावस्तु बहुत सुन्दर है।
Re: मैं आज़ाद हूँ?
प्रदीपजी आपकी प्रतिक्रिया पढकर अच्छा लगा, लोग कविता को इतनी गंभीरता से लेते है जानकर खुशी हुई, लेकिन सच कहूँ तो मैं अपनी लिखी हुई किसी भी कृति को कोई किसी श्रेणी में नहीं रखती, वे सिर्फ मन की भटकन से निकले शब्द होते हैं, जिनको कोई ठिकाना नहीं मिलता तो उन्हें एक साथ रख देती हूँ, खुद पढ‌ती हूँ, खुद खुश हो लेती हूँ, किसी को अच्छा लग जाता है जब उसकी भटकन से शब्द मेल खा जाता है, किसी को अच्छा नहीं लगता जब उनकी भटकन को मेरे शब्दों से कोई वास्ता नहीं होता......
Re: मैं आज़ाद हूँ?
nice job / जवाब
Re: मैं आज़ाद हूँ?
मैं भी अज़ादी चाहाता हूँ इस शरीर की दुनिया से, अपने मन की दुनिया से और उड़ना चाहता हूँ खुले असमान में| बादलों से पार| उस विराट अनंत की और|
अस्वीकरण