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फ़रवरी 2008

 

• ऑफिस की पार्किंग पर............

एक अधूरी कविता.............

ऑफिस की पार्किंग पर खड़े होकर कहता रहा मुझसे........ समय हो तो सब कुछ है वर्ना किसे फुर्सत है कि सोचे कि कभी प्यार भी हुआ करता था इन आँखों में अब तो सिर्फ चश्मा चढ़ा रहता हैऔर उँगलियाँ की-बोर्ड पर अटकी रहती है... हाँ कभी कम्प्यूटर हैंग हो जाता हैतो याद आ ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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• अर्ज़ किया है...

सतही हो जाता है, जब दिन भीड़ में गुज़र जाता है, मैं तेरी गहराई को नाप सकूँ काश वो तन्हाई मेरे साथ होती!! -शैफाली   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• रंजिश ही सही…..

एक शाम गज़ल के नाम

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आआ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आपहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तोरस्म-ओ-राहे दुनिया ही निभाने के लिए आकिस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हमतू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आकुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रखतू ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• उसकी लड़ाइयाँ

उसकी वो बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ उन लड़ाइयों के पीछे छोटे-छोटे कारणमेरा उसको समझाना और उसका झट से मान जाना....... रिश्ता अपेक्षाओं से उपर उठ चुका था लेकिन उपेक्षा से नहीं...............ब...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• मीठा समन्दर

नींद से निकले शब्द

सुबह की नींद में सराबोर आँखों में रात का कोई ख़्वाब अटक-सा गया था लफ्ज़ अँगड़ाईयाँ लेते रहे और कुछ पंक्तियाँ लबों पर थीं...... कि तेरे स्पर्श ने क्या जादू किया तू समन्दर से निकली और समन्दर मीठा हो गया......कागज़ पर उतारा उन लफ्ज़ों को तो गज़ल बन गई क्या जादू था ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• एटिट्यूड

एक और अधूरी कहानी .........

वह मुझसे अकसर पूछता था उसका एटिट्यूड कैसा है? बावजूद इसके कि उसकी अजनबियों वाली हरकतें मुझे पसंद नहीं थी। लोगों के सामने यूँ मिलता जैसे मुझसे कोई लेना देना ही नहीं। मुझसे प्यार ना करने की कोशिश में वह ठीक से दोस्ती भी नहीं निभा सका। और मैं सिर्फ प्यार ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• तुम और मैं

मेरी ज़िंदगी का वो हिस्सा जिसे तलाशती रही मैं बरसों..................   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• मैं आज़ाद हूँ?

हँस लेता हूँ खुद परजब कभी आज़ाद होने का खयाल आता है मैं घर छोड़ कर कई बार निकल जाता हूँक्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ ज़िम्मेदारियों से मैं शहर छोड़कर चला जाता हूँ अकसर क्योंकि मैं आज़ाद होना चाहता हूँ रोजी रोटी के झँझटों से मैं देश छोड़ कर चला जाता हूँ कभी ...   और पढ़ें...
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