श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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फ़रवरी 2008
सुबह की नींद में सराबोर आँखों में रात का कोई ख़्वाब अटक-सा गया था लफ्ज़ अँगड़ाईयाँ लेते रहे और कुछ पंक्तियाँ लबों पर थीं...... कि तेरे स्पर्श ने क्या जादू किया तू समन्दर से निकली और समन्दर मीठा हो गया......कागज़ पर उतारा उन लफ्ज़ों को तो गज़ल बन गई क्या जादू था ... और पढ़ें...