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चाँद का अचार



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



एक रात तन्हाई संग
छत पर टहलने निकली
तो देखा आसमान के आँगन में
चाँद का अचार रखा था

माँ उसे उठाना भूल गई थी
तो तारे उस पर लग गए थे
मैं उसे उठाकर ले आई
आँसुओं से धोया
और सपने के छज्जे पर रख दिया

जब कभी दोपहर बेस्वाद हो जाती थी
चाँद का अचार चख लेती थी
कभी कविता की रोटी पर चुपड़ लेती थी
कभी कहानी में उसका मसाला मल लेती थी

बहुत दिन बीत गए
चाँद का अचार खत्म हो गया
माँ भी नहीं रही
बेस्वाद-सी दोपहरें अब भी है
मीठी-सी शाम वो मज़ा नहीं देती

आज भी अकसर तन्हाई के संग
छत पर टहलने निकलती हूँ
तो याद आती है माँ
और चाँद का अचार......

प्रतिक्रियाएँ

Re: चाँद का अचार
वाकई लेखिका जी मानना पड़ेगा, आपके कल्पनारूपी इस गहरे सागर को |
Re: चाँद का अचार
बहुत बढि़या कल्पना की है। जीवन की एक कड़वी सच्चाई इस कविता के माध्यम से उजागर होती है। सचमुच मानना पड़ेगा तुम्हारी मन की आँखों को। जो इस कदर माँ और अचार को चाँद से जोड़कर तुमने अपनी लेखनी से मन में उमड़ रही उन भावनाओं को सबके सामने रख दिया।
Re: चाँद का अचार
वाह ! बहुत बढि़या। बहुत खूब !!!!!
Re: चाँद का अचार
आपका लेखन हमारे लिए बेहद खास है...यूँ ही लिखते रहें....
Re: चाँद का अचार
बहुत बढि़या कल्पना की है। जीवन की एक कड़वी सच्चाई इस कविता के माध्यम से उजागर होती है। सचमुच मानना पड़ेगा तुम्हारी मन की आँखों को। जो इस कदर माँ और अचार को चाँद से जोड़कर तुमने अपनी लेखनी से मन में उमड़ रही उन भावनाओं को सबके सामने रख दिया।
Re: चाँद का अचार
तुम भी ना .....
Re: चाँद का अचार
क्या बात है !!
Re: चाँद का अचार
बहुत ही बेहतरीन कविता लिखी है आपने. बहुत खूब्.
Re: चाँद का अचार
वाह क्या खूब तन्है का अचार डाला है आपने कब तक अमृता के प्रभाव मे लिखना है ? ओशोविन http://oshowin.blogspot.com
अस्वीकरण