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30 जनवरी, 2008


ब्लॉग्स (1)
एक रात तन्हाई संग छत पर टहलने निकलीतो देखा आसमान के आँगन में चाँद का अचार रखा था माँ उसे उठाना भूल गई थीतो तारे उस पर लग गए थेमैं उसे उठाकर ले आईआँसुओं से धोया और सपने के छज्जे पर रख दिया जब कभी दोपहर बेस्वाद हो जाती थी चाँद का अचार चख लेती थी कभी कविता ... आगे पढ़ें...