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मैं एक रूह




मैं एक रूह
देह के लिबास में
जीवन के शो रूम में सजाया हुआ

जिसका लिबास जितना सुंदर
उतनी ज्यादा उसकी कीमत
जो जितना आम फैशन से अलग
उतना यूनिक

मैं एक लिबास
रूह को पहनाया हुआ

जो जितने कम लिबास में
उतना ज्यादा कॉंट्रोवर्शियल

लिबास जितना पारदर्शी
आत्मा उतनी उन्मुक्त

मैं एक रूह
देह के गर्भ में पलती
जैसे एक माँ अपने बच्चे को पालती है
नौ महिने तक अपने गर्भ में
अपने अंदर पल-पल बड़ा होते अनुभव करती है
बाहर निकलने की छटपटाहट को अनुभव करती है

मैं एक देह
अपनी आत्मा को ऐसे पाल रही हूँ
जैसे कोई माँ अपने बच्चे को पालती है
दुनिया की बुरी नज़र से बचाकर........


प्रतिक्रियाएँ

Re: मैं एक रूह
रचना बडीया है.
Re: मैं एक रूह
आपकि कविता ने रुह को झकझोर दिया! आप की कविता मै किसी दूसरे ही लोक की सुगंध आती है! आप सदा खुश रहो और हमै अपनी सुंदर कविता का उपहार देते रहो
अस्वीकरण